टैग : Hindi poem

बेटियाँ

प्यारी सी बेटियों के क्यूँ अपने घर नहीं है होते,लक्ष्मी स्वरुपा विद्या दायिनी के अपने घर नहीं है होते ।  चाहती है वो गगन को छूना ख्वाहिश रखती है ख़्वाहिशों को नापने के उसके पास पर नही है होते। जिंदगी...

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एक बुरा ख़्वाब

जा रही थी स्कूल से घर को इक दिन अकेली , सँग ना थी कोई मेरी सहेली ।   इक वहशी जानवार था खड़ा रस्ते पे , आ धर दबोचा  मुझे यूँ जैसे बाज दबोचे किसी चिड़िया को, रोइ ,गिड़गिड़ाई, हथ जोड़े...

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मेरे पापा

पापा आप कहते थे,कभी हार ना नहीं।कभी किसी दबाव में ,कोई रिश्ता बनाना नहीं।।पापा आप तो कहते थे ,दुनिया में सब अपने हैं।मगर क्यों कोई आसपास भी अपना यहाँ भटकता नहीं।।सीखना और सीखाना आपने बताया,यहाँ किसी...

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तलाश करता हैं मेरा मन

तलाश करता हैं मेरा मन पहले जैसे ही वो दिन वो पहर, तलाश करता हैं मेरा मन पहले जैसे वो गाँव वो शहर,  तलाश करती हैं ये निगाहें उन पलो को, गुजरे लम्हो को, बीते बचपन के दिनों को, साल-महिनों को, 

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किताबें

अनायास ही एक साथी याद आया, जिसके साथ हर पल बिताया, उसी ने मुझे शब्दों से मिलवाया, विचारों का संकलन दिखलाया, रंग बिरंगी दुनिया से मिलवाया, प्रेम ,एकता की छवि दिखलाई,  प्राचीन संस्कृति...

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फिर भी औरत से नफरत करती हूं !

मैंने यह कविता 15 वर्ष की आयु में लिखी थी उस वक्त अखबारों में अधिकतर खबरें औरतों के ही ऊपर हो रहे शोषण पर होती थी। कभी-कभी मन औरतों के प्रति करुणा से भरता था और कभी क्रोध से। इन्हीं भावनाओं से ओतप्रोत यह कविता ने जन्म लिया था।...

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