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प्रेम इश्क़

 हे महायोगी जैसे बारिश की बूंदें बादलों का वस्त्र चीरकर पृथ्वी का स्पर्श करती हैं वैसे ही, मैं निर्वसन होकर अपना कलंकित अंतःकरण तुमसे स्पर्श करवाना चाहती...

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ख़्वाहिशें

मेरी कविता "ख़्वाहिशें " औरत को ऐसा जहाँ देना चाहती है।जो महफ़ूज महसूस कराती उसकी दुनिया में । एक ऐसा जहाँ तलाशती मेरी ख़्वाहिशें   बेटी की पैदाइश पर मनती हो ख़ुशियाँ  कन्या को देवी मान कर पूजते...

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टुकड़े दिल के

सिर्फ़ तुम्हारे लिए ही नहींधड़कता ये दिल मेरा और भी लोग हैं इसमें बसते एक नहीं कई टुकडे़ दिल के... आज भी याद आती है मां आज भी हो जाती मैं परेशां जब दर्द मेरे अपनों को मिलते...

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