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एसिड अटेक पीड़िता की मां से कही दिल की बातें❣️

सुनो मां चांद का टुकड़ा चांद का टुकड़ा,  कहना मुझको बन्द करो ना तो उस दिन ईद ही थी ना वो था चन्दा मामा मेरा दाग़ लगा है दामन मेरे ,रक्त रंजित है तन ये मेरा पर अब नहीं!......

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गर्व से कहती हूं नहीं मैं नहीं हूं चांद सी

खुला छप्पर खुला आसमान...बस चांद गौर किया दिन रैन...चढ़े मुझ पर भी उसका रंग...गुजरे जमाने नित नए रंग... बचपन से मन भरमाया सब...चांद सी सुंदर हो कहते बस...बनते-बनते चांद जैसा बनी...मैं सजावट...

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बहु हूँ बेटी ना बन पाई

छोड़कर बाबुल का घर - अंगना पहुंची ससुराल की देहरी के लिएआंखों में भरे थे सपने हजारदिल में ढेर सारी प्रीत लिए भूल कर अपना बचपन...

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बहु में छिप गई बेटी

 जन्म हुआ, आँगन में खिली, पंख फैलाया ,उड़ान भरने को तैयार हुई, चाहा था आसमां को छू लूँगी, पलकों को फैला खुद का वजूद बनाऊँगी , एक अजनबी ने आकर हाथ थामा ,अपने घर ले गया मुझे ,

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एक नई शुभारंभ हुई

मैं बेटी न बन पाई दिल में हजारों सपने संजोए ख्वाहिशों के समन्दर लिए बचपन के यादों का कारवां छोड़ आई पी तेरे घर मैं अब आई पर मैं बेटी न बन पाई ।          ...

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