तमाचा ....भाग-1

तमाचा ....भाग-1

आईने के सामने खड़ी हो कोमल दहकती अंगारे समान लाल आँखों से अपने चेहरे की एक एक बारीकी को निहार रही थी कि तभी.....


"बीप...बीप...बीप....."

"सॉरी कोमल....मैं अपने आपे से बाहर हो गया था...प्लीज़ मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था...आज बच्चों पर गलत असर पड़ा है... मेरा हाथ गलती से उठ गया तुम पर। ये बच्चों के सामने बहुत गलत हुआ... प्लीज़ मुझे शांत करने में मेरी मदद करो...मैं अब कभी...." वैभव (कोमल का पति) आफिस से मैसेज करता है।

कोमल वैभव का पूरा मैसेज पढ़े बिना फोन स्विच ऑफ कर बिस्तर पर फेंक देती है और वापस अपने चेहरे पर उभरे हुए वैभव के हाथों के निशान तमतमाई नज़रों से देखते सुबह का मंज़र उसके ज़हन में एक बार फिर कौंध जाता है....

"कोमल तुमने माँ की चोट का हाल-चाल जानने के लिए फोन किया था या उनकी दुखती रग पर हाथ रखने के लिए। तुम क्या समझती हो उन्होंने शह दे रखी है सुधीर (वैभव का छोटा भाई) को जो वो अपनी पत्नी को लेकर नहीं आ रहा। तुमने जो माँ को उसके लिए कहा वो सुधीर ने सुन लिया और खाना छोड़ कर चला गया। सुनकर माँ को कितना बुरा लगा। कलेजा मुहँ को आ गया। तुमने तो कसम खा ली है उनके पास ना जाने की। लोग ताने तो मुझे मारते हैं कैसी बहु है सेवा करना तो दूर सास को देखने भी नहीं आती।"

"अरे वैभव....ये सुधीर का नाटक है। नाटक ना होता तो अभी कैसे वापस आ के बैठा है मम्मी के पास वहाँ पर। मम्मी के कंधे पर बंदूक रख कर चलाता रहता है कि उसे कोई कुछ नहीं बोलेगा इसलिए तो मुहँ छिपाए छिपाए फिरता है। रात को देर से अंधेरे में चोरों की तरह आना और सुबह भोर से पहले चले जाना। क्या है यह सब???किसी रिश्तेदार से किसी पास पड़ोस से न मिलना....
...... तुम्हीं बताओ क्यों जब ऋचा (कोमल की देवरानी) चली जाती है तो माँ के पास रोज़ आते हैं देवर जी (सूधीर) और जब वापस ससुराल मम्मी के पास आ जाती है तो महीनों इनका अता पता नहीं होता। गुस्सा क्या कुछ घंटो का ही था जो वापस आ गए दुबारा.. कोई दीन ईमान नहीं है देवर जी का.....
..........आज पाँच साल हो गया ऋचा और सुधीर की शादी को और शादी के दो महीने बाद से ही ऋचा और हम सबकी आँखों में धूल झोकंता आ रहा है। बेचारी ऋचा अपने मायके से रोज़ फोन करके मुझसे पूछती रहती है कि "दीदी आज ये आएंगे क्या मुझे लेने???".....
...........सुनकर खून खौल जाता है मेरा लेकिन मम्मी को तो बस अपने बालक ही दिखाई देते हैं बहुओं का क्या। जाने कैसे संस्कार दिए हैं तुम्हारी मम्मी ने अपने बच्चों को और ये सुधीर मम्मी के पल्लू में दुबके बैठा रहता है। सब मम्मी की ही शह ...."

"चटाककक...."

तमाचे की आवाज़ के साथ कोमल सुबह के वाकया से बाहर आई। कोमल गुस्से में कापँते सोच रही थी

"......सुधीर को तुम मार नहीं सकते क्योंकि तुम कहते हो कोई बच्चा थोड़े ही है जो उसे मार कर समझाया जाए इससे तो वो और भड़क जाएगा और ऋचा को हमेशा के लिए छोड़ देगा जिसके साथ वो पहले ही नहीं रहना चाहता। तो मतलब मैं तो यहीं पड़ी रहूंगी तो मुझपर तुम आसानी से हाथ उठा सकते हो....
.......सब लोग बोलते हैं बहू नहीं आती सास का ध्यान नहीं रखती तो ये लोग तब कहाँ थे जब मैं इनके पास अपनी दो महीने की बच्ची को लेकर गई थी कि थोड़ा नयी माँ को इनका सहारा मिल जाएगा और इन्होंने क्या किया सहारा देने की बजाए अपना ही बहु सुख लेने में लगी रहीं। छोटी सी दूध से बिलखती पोती के बारे में भी न सोचा.......
..........दस साल से तुम्हारे साथ यहाँ शहर में नौकरी करते हुए हर साल जब जब कहते थे तब जाती थी दूसरे शहर में ससुराल जहाँ आज तक मेरा अपना एक भी कमरा नहीं। वहीं सबके साथ उठो बैठो और नहीं तो किचन में ही रात गुज़ार दो.....

......जहाँ बहु सेवा का सुख पिछले दस साल से मिलता था उन्हें और मैं सबको अपना समझ कर सब करती रही तब ये न तुम्हें और न ही तुम्हारे घर वालों को दिखा। तुम्हारी मम्मी के यहाँ न आने से बच्चों की देखरेख के लिए मुझे नौकरी का त्याग करना पड़ा........

............हर बार गलत के लिए विरोध करने पर तुम्हारे तमाचे मेरा स्वागत करते हैं और जिन तमाचों को मैंने अपने बच्चों से दस साल तक छुपा कर रखा आज तुमने वो राज़ भी राज़ न रहने दिया.....
.......हर बार तुम तमाचा ना मारने की कसम खाते हो और फिर कभी अपनी मम्मी, कभी सुधीर, कभी तुम्हारी बहन, कभी घर किसी न किसी वजह से आपे से बाहर हो मुझपर हाथ उठाते हो..............
.........नहीं वैभव, बस अब और नहीं। आजके बाद न तो मैं कभी तुम्हारे घर जाऊंगी और न ही तुम्हारे घर के सदस्य मेरे हैं। अब मेरी दुनिया में बस मैं और मेरे बच्चे हैं। मैं तुम्हारी पत्नी होने का चोला उतार रही हूँ। अब इस किराए के मकान में तुम्हारे साथ केवल अपने बच्चों की माँ बनकर रहूंगी.......
.........अब क से कोमल मर गई और क से कठोर कोमल ज़िदा हो गई है मुझमें वैभव। मेरे चेहरे पर पड़े इन निशानों का दर्द सिर्फ एक ही लक्ष्य यह बार-बार याद दिलाते रहेंगे खुद को और अपने बच्चों को मज़बूत बनाना है। अब वो होगा जिसकी तुम कल्पना भी नहीं कर सकते ----तमाचे के जवाब में अब तमाचा रसीद होगा...."

दोस्तों ये एक कड़वी सच्चाई है कि पत्नी अगर घर छोड़कर नहीं जाएगी तो पति उसे अपनी पब्लिक प्रापर्टी समझ उसके साथ बदसलूकी करता है और पत्नी के पास भी सहने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता पर विकल्प तलाशने पड़ते हैं इसलिए मुझे लगता है नौकरी करने से भी पहले अपने अंदर आत्मविश्वास जगाना ज़रूरी है कि कोई हमें हाथ न लगा पाए और जब आत्मविश्वास जाग जाएगा तो हम बिना डरे बिना अत्याचार सहे आत्मसम्मान से सर उठाकर जी सकते हैं। अपने बच्चों को अकेले भी पाल सकते हैं। तब हमारी सामना करने की शक्ति ही हमें सफल बनाती है।

आशा है आपको मेरी ये काल्पनिक परंतु सच का आईना दर्शाती कहानी पसंद आएगी। जल्द ही भाग - 2 आपके सामने प्रस्तुत करूंगी। 

पढ़ने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद। आपकी अभिव्यक्ति का इंतजार रहेगा। कृपया मुझे फालो भी कर लिजिएगा।

कहानी का दूसरा भाग पढ़ने के लिए क्लिक करें - https://www.thepinkcomrade.com/hi/tamcha-bhag-2

वाणी राजपूत

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