दोहरे मापदंड #BreakTheBias

दोहरे मापदंड #BreakTheBias

संस्कार परम्परा रीति रिवाज यह सब हमारे समाज का प्रमुख हिस्सा है या यह कहें कि इसी के इर्द गिर्द हमारा समाज है। बहुत ही खूबसूरत परम्परा और रीति रिवाज हैं हमारे पर कुछ परम्परा ऐसी भी हैं जो यह जताती हैं कि रिवाज बनाने वाला कोई पुरुष ही रहा होगा क्योंकि स्त्री और पुरुष के बीच एक ही परिस्थिती के लिए नियम अलग हैं।जिसने पुरुषों के लिए कोई ऐसा नियम नहीं बनाया जहां उसे कोई समझौता करना हो पर महिला को करने पड़ते हैं और यह सब आज की इक्कीसवीं सदी में अपने को आधुनिक कहने वालों की मानसिकता भी है।


हमारे समाज में रीति रिवाज के नाम पर बहुत से ऐसे नियम हैं जो सिर्फ़ महिलाओं के लिए हैं जिनका कई बार मैंने विरोध किया है और मुझे आश्चर्य होता है जब मैं महिलाओं को ही इन का समर्थन करते हुए देखती हूं चाहे वह किसी भी धर्म के हो।पर आज मैं जिस रिवाज की बात कर रही हूं वो है हमारे समाज में विधवा स्त्री के हक।


बात मेरे अपने ही घर की है पापा हम सब के साथ नहीं रहे बहुत मुुश्किल था अपने आप को संभालना । आज भी कमजोर पड़ जाते हैं हम वह सब याद करके।

पापा के जाने के साल भर बाद भईया की शादी हुई ।शादी की रस्मों से मम्मी अलग सी थी। जब हल्दी और तेल चढ़ने का समय आया तो मेरी चाची बोली ऐसी औरतों को रखना जो उतारने के समय भी रहें। हम भाई बहनों ने कहा कि शुरुआत मम्मी करेंगी तो मम्मी ने मना कर दिया पर हम लोग उनके पीछे पड़ गए कि आप क्या चाहती हो कि पापा के संग से तो हम दूर हैं आप भी नहीं करोगी तो कैसी खुशी होगी भईया को कि उन को मां बाप किसी का आशीर्वाद नहीं मिला और भला कोई मां अपने बच्चों के लिए खराब हो सकती है। उसके बाद हमने सब रस्में मम्मी से करायी। कुछ रिश्तेदार दबी जुबान में बोल भी रहे थे कि यह अपने ही रिवाज बना रहे हैं पर हमने किसी की परवाह नहीं करी।


मुझे खुशी है हम ने गलत रिवाज को तोड़ा।क्यों ऐसा रिवाज कि पति के बाद पत्नी से खुश रहने के हक ले लो जबकि पति के लिए ऐसा कुछ नहीं है जबकि दुख तो दोनों का समान है फिर कुर्बानी औरत से क्यों। उम्मीद करती हूं कि मेरी इस बात से सभी सहमत होंगी।


मौलिक

स्मिता चौहान

#BreakTheBias

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