दादी सास की पसंद

दादी सास की पसंद

"मां जी आज रात के खाने में क्या बनाऊं??"


खाना बनाने से पहले हर रोज कोमल अपनी सास से यही पूछती। शादी के इतने सालों बाद भी वो अपनी सास रमा जी से पूछकर ही खाना बनाती। खाना हमेशा ससुर की पसंद का होता या पति का, कभी-कभी रमा जी अपनी पसंद का कुछ न कुछ बनवा लेती।

कोमल बहुत ही सुलझी‌ हुई और समझदार लड़की थी। बड़े घर में जन्मी, मम्मी पापा की लाडली बेटी| हमेशा हंसती मुस्कुराती और सबको खुश रखने की कोशिश करती।

कोमल को पढ़ाई लिखाई में ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी, उसे कला से प्रेम था। उसे सिलाई, कढ़ाई, पेंटिंग तरह-तरह के पकवान बनाना और सबको खिलाना अच्छा लगता था।


इसलिए कोमल ने जब अपनी पढ़ाई पूरी कर ली तो उसके मम्मी पापा ने उसके लिए रिश्ता ढूंढना शुरू कर दिए।

कोमल के पापा की खोज तरूण पर आकर खत्म हो जाती है। तरूण सरकारी नौकरी करता था अच्छी खासी तनख्वाह थी और परिवार से भी संपन्न था। शादी की बात चलाई गई लड़का लड़की ने एक-दूसरे को देख लिया और पसंद भी कर लिया|

पन्द्रह दिन बाद सगाई और उसके एक महीने बाद शादी की तारीख पक्की हो गई। शादी के बाद कोमल को ससुराल में बहुत मान सम्मान मिला।

पति तरूण तो जान छिड़कता था उस पर| सास ससुर भी बहुत लाड़ लगाते अपनी बहु से। तरूण की बूढ़ी दादी तो अपने पलकों पर बिठा कर रखती उसे।


कोमल को इस घर में आए अब चार साल हो गए थे इन चार सालों में उसने गृहस्थी सजाने संवारने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। वो सबकी पसंद नापसंद, उनके खाने पीने सबका ध्यान रखती| ससुर जी और पति को कब क्या चाहिए सब ध्यान रखती।

इन चार सालों में कोमल अपनी पसंद नापसंद को भी नज़र अंदाज़ कर दिया था। इधर कुछ दिनों से कोमल देख रही थी ; "कि वो जब भी अपने सास से खाने में क्या बनाऊं पूछती तो उसकी दादी सास उसे मायूसी भरी नजरों से देखती"

उन्हें देखकर कोमल को ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वो कह रही हों कभी - कभी मेरी पसंद का खाना भी बना दो। वैसे तो दादी ने कभी भी अपनी पसंद नापसंद की बात नहीं कही, जो बना कर सामने परोस दिया जाता बेचारी चुपचाप खा लेती थी। हां कोमल ने अपनी सास से जरूर सुना था कि दादी खाने की बहुत शौकीन थी।

सास की कही हुई वो बातें याद कर कोमल सोचती है शौकीन से क्या मतलब है ! खाने का शौक तो इस उम्र में भी हो सकता है। आज कोमल को अपने ऊपर गुस्सा आ रहा था, वो सोच रही थी इतने सालों से उसने सबके पसंद का ख्याल रखा लेकिन बेचारी बूढ़ी दादी को क्या पसंद है इसका ख्याल मुझे कभी नहीं आया।

मैं कल ही दादी के पसंद का खाना बनाऊंगी। अगले दिन कोमल दादी के पास जाती है और पूछती है - दादी जी आज खाने में क्या बनाऊं?

दादी कोमल को आश्चर्य से देखती हैं और कहती हैं अपनी सास से पूछ ले ! रोज तो वहीं बताती है।



दादी जी, मां जी घर पर नहीं हैं आज आप बता दीजिए ना!

दादी जी ने रोज जो बनता था उसके आधार पर बेटे, पोते की पसंद को ध्यान में रखते हुए बता दिया।

कोमल समझ गई कि दादी अपने बेटे और पोते की पसंद बनाने को कह रही हैैं।

कोमल ने कहा - दादी जी आज मुझे आपका पसंदीदा खाना जानना है और बनाना भी है। मैंने आजतक कभी भी आपके पसंद का खाना नहीं बनाया। आपने भी कभी कुछ नहीं कहा कि आपको क्या खाना है।

दादी ने कहा- हमारे खाने का क्या है बहु जो बच्चे पसंद करेंगे हम भी वही खा लेंगे। पहले बच्चों की पसंद नापसंद को ध्यान में रख।‌

पर दादी जी इतने सालों से यही तो हो रहा है कि घर के मर्द को जो पसंद है घर में वहीं खाना बनता है और घर की औरतों भी वही खाती है।। कहीं न कहीं उनके पसंद के आगे हम अपनी पसंद को नजरंदाज करते हैं।

लेकिन अब ऐसा लगता है हमें भी अपनी पसंद, नापसंद का ध्यान रखना चाहिए| हम घर के मर्दों की पसंद का खाना बना सकते हैं तो कभी कभी अपनी पसंद का भी बना ही सकते हैं।

इसलिए दादी जी जल्दी बताइए आपको खाने में क्या खाना है मैं वही बनाऊंगी|


दादी ने अपने सारे पसंदीदा खाने के बारे में बता दिया| चार सालों में पहली बार कोमल ने दादी को इतना खुश देखा था। दादी ने कोमल को गले से लगाकर उसे ढेर सारा आशीर्वाद दिया|

दादी के कमरे से निकल कोमल रसोई में गई और दादी के पसंद का खाना बनाने लगी|

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