पकड़ कर मेरा हाथ चल पड़े इस डगर पर

पकड़ कर मेरा हाथ चल पड़े इस डगर पर

तुम्हारे घर में एक छोटा सा कोना चाहती हूं |

आई नवेली जब तुम्हारे अंगना
डरती झिझकती खड़ी तुम्हारे अंगना
रही देख तुमको इस आस से मैं
नई इस डगर पर खड़े साथ हो तुम भी
तुमने भी देखो ना उम्मीद तोड़ी
पकड़ कर मेरा हाथ चल पड़े इस डगर पर
इस संकल्प को फिर दोहराना चाहती हूं

तुम्हारे घर में एक छोटा सा कोना चाहती हूं |
ना कुछ जानना ना समझना चाहती हूं
तुम्हारे ही संग से तो पाया है
जीवन के संघर्ष से पार हमने
खो सा गया है वह स्नेह सारा 
इस जीवन के तूफान और आंधियों में प्रियतम
मान मनुहार पहले सा फिर चाहती हूं
तुम्हारे दिल में एक छोटा सा कोना चाहती हूं
तुम्हारे घर में एक छोटा सा कोना चाहती हूं |

मेरा मन हुआ जा रहा भाव विह्वल
मथता रहा भावों का अथाह समंदर
वही पहले सा फिर समर्पण चाहती हूं
तुम्हें बस तुम्हें पाना चाहती हूं
तुम्हारे घर में एक छोटा सा कोना चाहती हूं |
यह है हक और अधिकार मेरा
जिसे पूरी शिद्दत से मैं मांगती हूं
नहीं चाहती यह धन और यह दौलत
जीवन का हर सुख मिलने से पहले
अपना सम्मान पाना चाहती हूं
तुम्हारे घर में एक छोटा सा कोना चाहती हूं |

यह छोटी सी ख्वाहिश रही जो अधूरी
इसे पूरा करना है कर्तव्य तुम्हारा
आशा और उम्मीद का दामन थामे
तुम्हारे घर में एक छोटा सा कोना चाहती हूं |

By Sushma Rathore

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