पुराना दोस्त

पुराना दोस्त

इस बार की गर्मी की छुट्टियों में मै अपने बच्चों को लेकर घर आ गया| पत्नी और बच्चों की शिमला जाने की इच्छा थी, लेकिन सबको इच्छा करते ही इच्छित मिल जाता तो जीवन, स्वर्ग ही होता। ख्वाब और हकीक़त के बीच का फर्क ही तो जीवन है | जवानी की शुरुआत में, मैं इस तथ्य को बिलकुल नहीं अपनाता था और सब कुछ मुमकिन है जैसी अनर्गल बातो पर भरोसा करता था, लेकिन उम्र चालीसा पहुचने पर आपको यथार्थ ज्यादा दिखने लगता है, सपने कम।

मथुरा, धीरे धीरे शहर बनता जा रहा है ,लेकिन उसके अन्दर का गाँव अभी मरने को तैयार नहीं हैं,आखिरी सांसों में भी पुरजोर विरोध कर रहा है आधुनिकता का। यही कारण से कहीं कहीं आपको शहरीकरण देखेगा वही दूसरी तरफ गाँव। पिज़्ज़ा हट के ठीक बाहर, उंघती गाय कुछ ऐसा ही उदहारण है |
बच्चों को हफ्ते में एक बार बाहर ले जाना और पिज़्ज़ा , बर्गर या फ्रेंच फ्राइज जैसा कचरा खिलाना, आधुनिक भारत द्वारा पिता पर थोपी गई नयी जिम्मेदारी है। इसका निर्वहन न कर आप अपना पित्रधर्म पूरा नहीं कर पाएंगे। पिज़्ज़ा हट में मेरी नजर दूसरे परिवार पर पड़ी जिसके मुखिया पर मेरी नजर टिक गई , मैंने उसे काफी देर तक देखा और इस निष्कर्ष पर पंहुचा के वो प्रदीप था | मेरे स्कूल का सहपाठी जो पहले दर्जे से बारहवीं तक मेरे साथ स्कूल में था।

स्कूल के समय में मेरी और उसकी अच्छी बनती थी, लेकिन स्कूल खत्म होने के बाद संपर्क टूट गया और दोस्ती भी। बीच बीच में सुनने में आता के उसने अपने पिता का कारोबार संभाल लिया है| प्रदीप को पहचानने में मुझे बहुत ज्यादा समय लगा, इसके कारण भी जायज है | स्कूल में वो एक एक लकड़ी के सामान सूखा शरीरधारी था, लेकिन आज तो तने जैसा चौड़ा था| स्कूल में उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी मेरी थी, राजकीय कॉलेज के लडकों के साथ हुई लड़ाई में मेरा सर इसके चक्कर में फट गया था। भाईसाब का शरीर हल्का था लेकिन बातें ऐसी के साधू को भड़का कर शैतान बना दे। प्रदीप पूरा दिन मेरे घर पड़ा रहता। मन करा पुराने दिनों की तरह उसके कंधे पर जोर से हाथ मार कर पूछूँ ”

“किसे घूर रहे हो जी इतनी देर से, तुम्हरी हरकतें नहीं सुधरती ” बीवी ने ध्यान तोड़ते हुए कहा
“कुछ नहीं, लगा कोई परिचित देखा मैंने” मैंने हडबडाते हुए कहा
“कहा, कौन, वो दानव सा आदमी या उसकी सुडोल बीवी, कैसे कपडे पहन कर आई है ” बीवी ने सवाल के साथ साथ प्रदीप की बीवी को एक चरित्र प्रमाण पत्र भी दिया
“कोई नहीं यार , हो गया है तो चलो , ” मैंने झुन्झुलाहट में कहा

मेरा मन प्रदीप को मिलना चाह रहा था, लेकिन श्रीमती जी का मूड बिगड़ गया था. उसके अलावा कुछ भीतरी मुझे रोक रहा था, इतने साल बाद वो पहचानेगा या नहीं, मिलकर बात भी किस मुद्दे करेंगे, ये कोई उम्र थोड़े न रही यारी दोस्ती की, इसी सोच में डूबा मैं पार्किंग की तरफ चला।

गाडी का गेट खोल कर बीवी बच्चे अन्दर बैठ गए, मेरे गाडी मोड़ते ही प्रदीप मुझे मॉल के गेट पर देखा, मन तो किया छोड़ो यार चलते हैं , लेकिन बचपन जोर मार गया। समय गुजर गया तो क्या हुआ, वो मेरे जीवन के सबसे खुबसूरत पलों का साथी था। बेफिक्रे उड़ते हुए पंछियों का समूह था हमारा, जहां न भविष्य के चिंता थी न भूत का पछतावा, सब कुछ कितना सुन्दर था। ज्यादा से ज्यादा क्या होगा वो मुझे पहचानेगा नहीं, दोस्तों से बात करने के लिए कोईमुद्दा थोड़े ही चाहिए, दोस्ती का उम्र से क्या लेना देना। मेरा बचपन ने मेरे संकोच को एक झटके में खत्म कर दिया।

“मैं एक मिनट में आता हूँ” मैंने गाडी से चाबी निकालते हुए कहा
“अरे अब क्या भूल आये , भोले बाबा” पत्नी के कटाक्ष मुझ पर कोई असर नहीं पड़ा

मैं प्रदीप के पास पहुंचा और स्वत ही मेरे अन्दर से निकला
“और बे सुक्कड़ क्या हाल है , बड़ी चर्बी चड़ा ली है ”
“अरे पहलवान मेरे भाई क्या हाल है ”प्रदीप ने थोडा समय लेते हुए बोला
हम दोनों गले मिले, प्रदीप का परिवार कुछ समझ नहीं पा रहा था, प्रदीप के बच्चे , अपनी माँ से पूंछ रहे थे
“मम्मी ये सुक्कड़ क्या होता है ?”

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