तुम ही समझ लो ना

तुम ही समझ लो ना

तुम्हारी पनाहों में ढूंढ लेती हूं 
अपने दिल का सुकुन 
नाचता है मन का मोर 
सुन तुम्हारी धड़कनों की धुन 
हर लम्हा बडा़ खूबसूरत गुजरता है 
तुम्हारी पनाहों में जी भर संवरता है 
वरना तुम्हारे बिना तो एक पल भी सदियों सा लगता है 
तुम्हारे वजूद का सम्मिश्रण बन खुद में इतराती हूं 
तुम्हारी मदहोश निगाहों में जब खुद को ही पाती हूं 
तुम्हारी प्रीत के धागों से बुनी  चुनरी 
ओढ़ अपने श्रृंगार में चार चांद लगाती हूं 
तुम क्या जानो तुम्हारी मौजूदगी 
पूरी दुनिया है मेरे लिए 
उन चंद लम्हों में कई सदियां जी जाती हूं                   

मगर नहीं करती बयां शब्दों में  जानती हूं                       

तुम ही समझ लो ना हर अनकहा भाव                         

महसूस कर लो हर अनछुुुआ अहसास |

 

- सीमा शर्मा "सृजिता"

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