तुम सही थी मेरी दोस्त !

तुम सही थी मेरी दोस्त !

कैसा रहा आज स्कूल में दिन!”
“बस ठीक था मम्मा।” कह मुंह लटकाते हुए अपना बैग एक तरफ रख महक अंदर कमरे में चली गई। स्कूल से आते ही हमेशा चहकने वाली महक को ऐसे उदास देख अंजू समझ गई थी कि स्कूल में कुछ ना कुछ बात हुई है। कपड़े बदल कर महक जब बाहर आई तो खाना डालते हुए वह बोली “आज तेरी पसंद की मटर पनीर बनाई है।”
“मम्मा मुझे भूख नहीं है।”

“क्या बात है भूख क्यों नहीं है? अपनी मम्मी को नहीं बताएगी स्कूल में क्या बात हुई!”
“कुछ नहीं बस मुझे नींद आ रही है।” अच्छा जी वैसे तो अपनी मम्मा को अपनी बेस्ट फ्रेंड कहती हो और मम्मी से ही बात छुपा रही हो। आज तुमने अपनी बेस्ट फ्रेंड आरुषि का भी कोई किस्सा नहीं सुनाया। जब तक तुम दोनों की बातें ना सुन लूं मुझे खाना ही हजम नहीं होता।”

“उसका तो नाम भी ना लो। नहीं है वह मेरी बेस्ट फ्रेंड।” इतना कह वह रोने लगी।
“ओहो लगता है आज तो दोनों सहेलियां चोटी पकड़कर खूब लड़ी हो।”उसका सिर कंधे पर रखते हुए अंजू बोली। यह बात सुनकर रोते-रोते  महक की हंसी छूट गई। ” कैसी बात करती हो मम्मा। आप के समय में ही होता होगा ,यह सब। हमारे में नहीं।” 

” ओहो चलो हमारे समय की बात सुनकर हमारी रानी को हंसी तो आई ।जरा बताओ तो मम्मी को उसकी पक्की सहेली आई मीन बैस्टी ने क्या कह दिया।” ” कोई बैस्टी नहीं है वो मेरी । आज के बाद उससे बात नहीं करूंगी।” “हुआ क्या कुछ बताओगी!” ” आपको तो पता है ना मम्मी हिंदी में हाथ तंग है मेरा। पहले तो आरुषि मेरा काम कर देती थी। नहीं तो अपनी कॉपी दे देती । जिससे मैं उसमें से कर लेती थी ।

लेकिन अब उसमें ज्यादा ही एटीट्यूड आ गया है। कहती है कि तुम्हें जो नहीं आता उसे सीखने की कोशिश क्यों नहीं करती तुम । पहले खुद करो, जो नहीं आएगा तो मैं तुम्हें समझा दूंगी। अरे, थोड़ा बहुत दिखा देगी तो क्या फर्क पड़ जाएगा । बेस्ट फ्रेंड होते किस बात के लिए हैं। अपनी फ्रेंड्स की हेल्प करने के लिए ना!”

“बेटा सही तो कह रही है आरुषि। मुझे तो उसकी कोई बात गलत नहीं लगी। बिना पाठ को समझे, कॉपी करना अच्छी बात नहीं। बिना समझे केवल रट्टा मार , अगर तुमने इस विषय में नंबर ले भी लिए तो ऐसे नंबरों का क्या फायदा। तुम ही सोचो। कितनी बार मैंने भी तो तुम्हें हिंदी पर पकड़ मजबूत बनाने के लिए प्रैक्टिस करने के लिए कहा है। पर तुम ध्यान ही नहीं देती और वह यह सब तुम्हारी भलाई के लिए ही कर रही है।” ” मम्मी आप भी उसकी साइड ले रही हो। मेरी हेल्प ना करके, मेरी क्या भलाई कर रही है वह!”

“अच्छा मैं तुम्हें एक किस्सा सुनाती हूं। शायद फिर तुम्हें समझ आ जाए कि वह तुम्हारी लिए अच्छा ही सोच रही है। यह बात मेरे  बीएड के समय की है।  मेरी बेस्ट फ्रेंड थी रेनू । उसकी ड्राइंग बहुत ही अच्छी थी। मैं भी तुम्हारी तरह शुरू शुरू में अपने हर असाइनमेंट पर उसको ड्राइंग करने के लिए कह देती । कुछ दिनों तो उसने बना दिया। फिर एक दिन वह मुझे समझाते हुए बोली ‘अंजू तुम खुद करने की कोशिश क्यों नहीं करती। तुम्हारी राइटिंग कितनी अच्छी है ।देखना प्रैक्टिस करोगी तो ड्राइंग भी अच्छी हो जाएगी ।’

मैंने अनसुना करते हुए कहा ‘अरे जब मेरी फ्रेंड है तो मुझे इन झंझटों में क्यों पड़ना। 2 साल की ही तो बात है ।’ तो वह बोली 2 साल के बाद तुम्हें इसकी जरूरत नहीं पड़ेगी। मैंने हंसते हुए कहा, तब की तब देखी जाएगी। अब तो तुम कर दो। यह सुन वह थोड़ा गुस्से से  बोली, नहीं अब मैं तुम्हारे लिए कोई ड्राइंग नहीं करूंगी। तुम खुद ही बनाओ। पहले तो मुझे लगा वह मजाक कर रही है लेकिन एक दो बार कहने के बाद भी जब उसने नहीं बनाया तो मुझे भी गुस्सा आ गया और मैंने मन में सोच लिया कि अब मैं इससे कभी बात नहीं करूंगी और अपना काम खुद कर लूंगी।  वह तो रोज की तरह मुझसे गर्मजोशी से मिलती लेकिन मैं उससे सीधे मुंह बात ना करती  ।

मैंने मन में ठान लिया था कि मुझे अपनी ड्राइंग बेहतर करनी है और इसी जिद में मैंने ड्राइंग पर ध्यान देना शुरू कर दिया। कुछ ही दिनों में अपनी ड्राइंग में सुधार देखकर मैं खुद भी हैरान थी। मुझे समझ आने लगा था, रेनू की बातों का मकसद। लेकिन अपने अहम के कारण मैं उससे आगे बढ बात नहीं करना चाहती थी। कुछ ही दिनों बाद हमारे फाइनल असाइनमेंट की फाइल जमा हुई तो सभी टीचर्स ने मेरी बहुत तारीफ की।

मुझे तो अपने कानों पर यकीन नहीं हो रहा था । पीछे मुड़ के देखा तो मेरी कामयाबी पर तालियां बजाते हुए रेनू मुस्कुरा रही थी। उस दिन मुझे एहसास हुआ कि उसकी ना करने के पीछे  कितनी गहरी सोच व मेरे लिए अच्छाई छिपी थी। उसकी वजह से मैं अपने अंदर छिपी नई प्रतिभा को पहचान सकी। तुम्हारी तरह मैं भी बिना सोचे समझे उसके बारे में ना जाने क्या-क्या सोच बैठी थी। मुझे बहुत शर्मिंदगी हो रही थी।

मैंने आगे बढ़ रेनू से इस बात के लिए माफी मांगनी चाही तो उसने आगे बढ़ मुझे गले लगा लिया। मेरी प्यारी बिटिया रानी मुझे तो लगता कि आरुषि भी तुम्हारे लिए ऐसा ही सोचती होगी । ऐसी छोटी-छोटी बातों के लिए अच्छे दोस्तों को नहीं खोना चाहिए।”

इतनी देर से अपनी मम्मी की बातों को गौर से सुन रही महक बोली “मम्मा आप ठीक कह रहे हो। आरुषि भी मुझे आपकी फ्रेंड रेनू आंटी की तरह ही समझाती है। शायद मैं उसे समझ ना पाई। आज गुस्से में शायद मैं अपनी एक अच्छी दोस्त को खो देती। थैंक्स मम्मा, इतनी अच्छी तरह से मुझे समझाने के लिए। आज से आपकी तरह मैं भी हिंदी में सुधार करने के लिए खूब मेहनत करूंगी और कल जाकर आरुषि से अपने आज के बिहेवियर के लिए माफी मांगूंगी।”

“मुझे अपनी समझदार बेटी से यही उम्मीद थी।” अपनी बेटी को प्यार करते हुए अंजू बोली।
दोस्तों, कैसी लगी आपको यह रचना? पढ़कर इस विषय में अपने अमूल्य विचार जरूर दें।

सरोज ✍️

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