तुमने सारे हक खो दिये हैं !

तुमने सारे हक खो दिये हैं !

मान जाओ जरा ! रूक भी जाओ |अब यह सब कैसे कहूं मैं और अब किस रिश्ते से कहूं मैं ? तुमने तो एक ही पल में सब कुछ खत्म कर दिया अब ! शायद तुमने मुझे कमजोर समझ लिया पर , मैं कमजोर नहीं ! तुम्हारी जुदाई से मैं टूटने वाली नहीं | इतना सोचकर रूचि ने अपने बेटे को गोद में उठाया और फिर बेटे को चुप कराती हुई अपने कमरे में चली गई |

शांत एकांतचित्त एक एक पलों में गुम हो जाती रूचि आँसुओं को पोंछकर खुद को ही समझाती है | चार साल की यादों को विशाल नें पल भर में ही खत्म कर दिया , सिर्फ पैसों की खातिर ! उन्हें प्यार नहीं था कभी मुझसे ? और मैं प्रेम के बंधन में वशीभूत थी | तुम्हारी हर जिल्लत को बर्दाश्त करती रही पर , अब नहीं ! रूचि और विशाल की शादी को चार साल हुये थे | सब कुछ तो देखकर मां ने शादी की थी रूचि की | रूचि खुद एक अच्छी कंपनी में कार्यरत थी अच्छा खासा पैसा कमा रही थी और विशाल के घर वालों ने भी तो यही बताया था न कि विशाल अच्छी नौकरी में है | सबने यही सोचा दोनो कामकाजी हैं दोनो के बीच भरपूर प्यार रहेगा यही सोचकर दोनो की शादी होती है दोनो ही अलग अलग शहरों में थे सो एक दूसरे से कभी कभार ही मिलते थे | कभी विशाल ,रूचि के पास जाते तो कभी रूचि ! इस तरह दोनों की शादी को दो साल बीत जाते हैं | और रूचि एक बेटे की मां बन जाती है |                                       

रूचि , बेटे की परवरिश के साथ - साथ नौकरी भी संभाल रही थी | तभी एक दिन अचानक रूचि के पास विशाल का आना होता है  | रूचि , विशाल को देखकर बहुत खुश होती है कि अब हम तीनों ही कुछ दिन साथ रहेंगें इसी हंसी खुशी में एक महींना बीत जाता है और रूचि ने विशाल से पूछा " विशाल कितने दिनों की छुट्टी मिली है आपको इस दफा " ? विशाल , रूचि की बात सुनकर सकपकाता है और कहता है नौकरी नहीं रही मेरी |                                                                     

अब रूचि ने कहा :- पर, क्यों ?विशाल नें कहा :- निकाल दिया कंपनी ने मुझे क्योंकि वह घाटे में चल रही थी | रूचि ने विशाल को समझाया और कहा कोई बात नहीं विशाल मैं हूं न् ! सब ठीक हो जायेगा और तुम्हें एक न एक दिन कोई अच्छी नौकरी जरूर मिल जायेगी | वैसे भी ठीक ही तो है तुम मेरे पास रहोगे तो मेरी और बच्चे की कुछ मदद हो जायेगी………… रूचि ने मुस्कुराते हुए कहा | 

रूचि फटाफट घर के काम निपटाती है और काम पर चली जाती है पर जब रूचि घर वापस आती है तो सारा घर अस्त व्यस्त रहता है कहीं बुझी हुई सिगरेट के टुकड़े तो कभी घर पर बिखरे ताश के पत्ते ! रूचि माजरा समझ न पाती | धीरे धीरे घर में खाली शराब की बॉटले भी मिलने लगी और एक दिन रूचि के मकान मालिक नें रूचि से घर खाली करने को कहा | रूचि नें इसका कारण पूछा तब मकान मालिक नें बताया कि मुझे ये रोज रोज का तुम्हारे घर पर फालतू लोगों का आना जाना पसंद नहीं हम अपने परिवार के साथ रहते हैं तुम्हारा पति दिन रात नशे में झूमता घर के बाहर आता जाता रहता है | मकान मालिक की बातों को सुनने को बाद रूचि नें सोचा विशाल के पास कोई काम नहीं है खाली दिमाग शैतान का घर होता है कुछ न कुछ करना होगा विशाल के लिये, नहीं तो बात बिगड़ सकती है | रूचि ने विशाल के लिये अपनी कंपनी में बात की और विशाल को नौकरी मिल जाती है | परंतु विशाल यह कहकर मना कर देता है कि पत्नी के साथ काम करना शोभा नहीं देता | रूचि के बहुत समझाने के बाद भी विशाल नहीं मानता | ऐसे ही वक्त धीरे धीरे बीत रहा था और विशाल को बुरी आदतों के कारण पैसों की ज्यादा जरूरत पड़ने लगी वह रूचि के सामने हाथ फैलाने लगा परंतुु रूचि , विशाल को पैसे नहीं देती जिसके कारण विशाल , रूचि पर हाथ उठाने लगता है अब रूचि धीरे धीरे घरेलू हिंसा की शिकार हो रही थी |                                                       

आखिरकार रूचि नें एक दिन अपने ससुराल फोन किया और सारी आपबीती अपनी सास को बताई परंतु उसे सासुमां से कोई जवाब न मिला | उल्टे उससे यह कह दिया गया कि मेरा बेटा नौकरी नहीं करेगा एक ही तो बेटा है मेरा क्यों रहे वो परदेश में ?  ऐसे ही दिन रूचि के घरेलू हिंसा में बीत रहे थे और एक दिन रूचि को विशाल की सारी चोरी मालूम पड़ती है | विशाल के एक एक धोखे रूचि के सामने आ रहे थे कि विशाल नें कभी कोई नौकरी की ही नहीं उसने मुझसे झूठ बोलकर शादी की | सारी बुरी आदतें विशाल में पहले से हीं थीं | सब जानने के बाद रूचि नें विशाल को खूब समझाया कि विशाल मैं तुम्हें दुर्गुणों के लिये पैसे नहीं दे सकती | मुझे भी घर चलाना है इतना मैंने विशाल से कहा तो क्या गलत क्या था इसमें | पैसों के लिये अपने बेटे तक पर हाथ उठा दिया तुमने तो मैं कैसे सहन करती ? रूचि और विशाल के बीच कहासुनी होती है इसी तरह रूचि तनाव में घिरती चली जाती है | बहुत कोशिशों के बाद भी विशाल के ऊपर रूचि की बातों का कोई फर्क न पड़ा और एक दिन रूचि विशाल की बुरी आदतों के कारण विशाल को घर से निकाल देती है यह कहकर कि तुमने सारे हक खो दिये हैं  |                                                                               

मैंने तुम्हें कितना प्रेम किया और तुमने सिर्फ पैसों से प्रेम किया सब कुछ तो तुम्हारा ही था पर अब नहीं  | रूचि की बातें खत्म होती हैं और विशाल घर के बाहर दहलीज पर कदम रखते हैं कि रुचि के मन से फिर आवाज उठी मान जाओ जरा रुक भी जाओ पर नहीं मुझे पता है कि विशाल में कोई सुधार नहीं होने वाला और विशाल घर से चला जाता है फिर कुछ साल बाद दोनो का तलाक हो जाता है और अब रुचि काम के साथ-साथ अकेले ही बेटे की परवरिश करते हुए शांति का जीवन व्यतीत करने लगती है |                                                                                                                       

धन्यवाद                                                                   

रिंकी पांडेय

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