उडा गुलाल, भर पिचकारी, रंगों से भर ले फिर ये जिंदगानी!

उडा गुलाल, भर पिचकारी, रंगों से भर ले फिर ये जिंदगानी!

दादी चाची कहां हैं? चाची चाची!” मोहल्ले के बच्चों की टोली देविका को पुकार रही थी और वह कमरे में बैठी अपने बीते दिनों को याद कर रो रही थी। देविका की सास ने बच्चों से कहा बेटा “तेरी चाची की तबीयत खराब है ।आराम कर रही है।” “अरे दादी, चाची को कहो हम सब कल होली खेलने की प्लानिंग के लिए आए हैं।  आपको तो पता ही है ना  की हर साल चाची हमें होली हुड़दंग के नए-नए तरीके बताती है। कहो ना एक बार कि हमसे मिल ले।”

” अच्छा अभी तुम जाओ शाम तक उसे आराम हो जाएगा तो तुम्हें बुला लूंगे ।” बच्चों की टोली उदास नजरों से देविका के कमरे की ओर देखती हुई, बाहर निकल गई।

बच्चों के जाने के बाद देविका की सास अंदर आई और बोली “बहू कब तक आंसू बहाती रहेगी उसकी याद में। क्या हाल बना लिया है तूने अपना। किसी के जाने से जीवन थमता नहीं है। तेरा पति गया है तो मेरा भी बेटा गया है !” कह उनकी आंखें भी छलछला गई। “पता है ना तुझे होली खेलते देख कितना खुश होता था वह। बहु जाना तो सबको एक ना एक दिन है। पर यह तो देख कितने अच्छे कारज के लिए शहीद हुआ है ।अगर वह उस दिन सही समय पर ना पहुंचता तो आतंकवादी उस मकान को उडा देते। जिसमें उन्होंने बच्चों को कैद कर रखा था। कितनी मांओं की गोद उजड़ने से बचा ली उसने। बस बहु अपना दर्द पी जा और बिखेर दे इन बच्चों के चेहरे पर मुस्कान।”

“कैसे भूल जाऊं मांजी! जब कभी होली पर आते थे , उन्हें देखकर ही मैं रंगों से सराबोर हो जाती थी । होली खेलना तो सिर्फ बहाना था। अब किसके लिए भीगूं रंगों से!”

“अपने व उन दूसरे बच्चों के लिए पगली।‌ इतना तो तुझे भी पता है ना कि उसे होली का त्यौहार ज्यादा पसंद ना था। लेकिन तेरा होली खेलने के लिए इतना चाव देख वह भी कितनी तैयारियां करवाता था। तुझे होली खेलते देख, कितना आनंद आता था उसे। याद है, तुझे हमेशा कहता था कि मुझे तो तू होली के रंगों की तरह हमेशा सतरंगी कपड़ों में सजी अच्छी लगती है। उतार दे अपने तन व मन से उदासी का चोला और फिर से जिंदगी की नई शुरुआत कर।”

” हां मम्मी दादी सही कहती है। हमें भी तुम ऐसे चुपचाप अच्छी नहीं लगती। हमें तो हमारी हमेशा हंसते खिलखिलाते रहने वाली मम्मी ही अच्छी लगती थी। आप हमें डांटों , मारो लेकिन ऐसे उदास मत हो मम्मी !”

उन सब की बात सुन देविका कुछ ना बोली उसके मन में दुख का समुद्र रह-रहकर हिलोरे ले रहा था। जो आंसू के रूप में लगातार टूटे हुए बांध की तरह बह रहा था। उसे यू रोता देख उसकी सास ने उसे गले लगा तसल्ली दी और बाहर आ गई।
अगले दिन देविका ने देखा की गली में कोई चहल-पहल नहीं थी। बच्चे अपने घर के बाहर चुपचाप बैठे थे। उसने अपनी सास से कारण पूछा तो उसकी सास बोली “बहू तुम्हें तो पता है ना हर साल तुम्हारे साथ ही बच्चे कैसे हुड़दंग मचाते थे। कहते हैं चाची नहीं खेलेगी तो हम भी होली नहीं खेलेंगे।”

” यह क्या बात हुई भला मां जी ! उन्हें समझाते क्यों नहीं उनकी मां।”

“बहू वह तो छोटे हैं। तुम तो समझदार हो।‌तुम क्यों नहीं समझती! “बेटे की तस्वीर की ओर इशारा करते हुए बोली “क्या तुझे यूं बेरंग देख उसे अच्छा लग रहा होगा!”

देविका ने अपने पति की तस्वीर की ओर देखा तो उसे ऐसा लगा मानो वह कह रहे हो ‘अरे पगली आज के दिन भी ऐसी सूखी रहेगी क्या! चल मुझे टीका लगा और बच्चों के साथ वही मस्ती कर। तुझे बच्चों की तरह होली खेलता देख कितनी खुशी मिलती है मुझे। उठा गुलाल और टीका लगा मुझे!’

“बहू कहां खो गई। सुन रही है ना मैं क्या कह रही हूं।”

“हां मां जी, उसने गुलाल लिया और अपनी सास के चरणों में डाल आशीर्वाद लिया। फिर अपने पति की तस्वीर पर टीका लगा जैसे ही वह बाहर निकली, बच्चों के चेहरे पर खुशी के अनेक रंग बिखर गए ।उन्हें खुश देख देविका को यह लगा मानो पीछे खड़े उसके पति उसे कह रहे हैं

‘चल उड़ा गुलाल, मार पिचकारी और रंग ले फिर से अपनी दुनिया सारी!’

दोस्तों कैसी लगी आपको मेरी यह रचना, पढ़कर इस विषय में अपने अमूल्य विचार जरूर दें।

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