उलझें धागे ऊन के और माँ! Blog post by Sangita Tripathi

उलझें धागे ऊन के और माँ! Blog post by Sangita Tripathi

सर्दियां अपनी चरम सीमा पर है,मैंने बॉक्स खोला, कुछ और गर्म स्वेटर निकालने को, अचानक पीले रंग पर कई रंगों की डिजाइन वाले लम्बे स्वेटर पर निगाहें पड़ी। स्वेटर पर हाथ फेरते, माँ का स्पर्श महसूस कर ऑंखें भर आई.। बनाने वाली तो नहीं रही, पर उनके प्यार की गरमाहट लिये, वो स्वेटर हर सर्दी में, मुझे, बीते दिनों की सुखद यादों में ले जाता..।


 बचपन में माँ को स्वेटर बिनते देख मुझे भी स्वेटर बीनने का शौक हुआ। करना ही क्या, बस फंदे डालो और सीधा, उल्टा बुन लो..। माँ से आग्रह किया मुझे भी सीखा दो.। माँ मेरी प्रवित्त जानती थी, उनकी बेटी चंचल है,, किसी कार्य के प्रति स्थिरता नहीं है।पहले माँ ने टाल -मटोल किया। "अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो ",...। पर मेरी जिद के आगे उनको घुटने टेकने पड़े।उस समय मै नाइन्थ क्लास में थी।


 लाल इमली का प्योर पीले रंग का ऊन मंगवाया गया। उस पर डिजाइन डालने के लिये, मरून, काले , सफ़ेद रंग के भी कुछ ऊन मंगवाये गये। माँ ने पहले पुराना ऊन दे, मुझे सीधा, उल्टा बुनने का अभ्यास करने को कहा। पर मेरे अंदर इतना धैर्य कहाँ...।मै दो सलाई बुन कर, पीला ऊन ले माँ के पास हाजिर, माँ ने समझाया भी, पहले अभ्यास कर लो। बुनाई में सफाई आ जायेगी। मै सीधे नये ऊन से बुनने के लिये उत्सुक थी। अतः बॉर्डर के लिये फन्दे डाल, बुनना शुरू किया, बॉर्डर पर ही डिजाइन डालनी थी तीन रंग से, अनाड़ी मै, सारे ऊन उलझ गये, ऊन सुलझाया तो फंदे गिर गये। मै परेशान, माँ तो बिना देखे भी, सीधा, उल्टा बुन लेती है।


 ऊन से पूरा दिन उलझने के बाद मैंने हार मान ली, माँ को सारे ऊन वापस दे दिये, आप ही बनाओ। माँ बोली, नहीं तुम ही बनाओगी, मै तुम्हारी मदद कर दूंगी, पर अब तुम ही बनाओगी।मैंने इंकार कर दिया, तब माँ ने मुझे पकड़ कर बैठाया, "क्यों नहीं बुनना चाहती हो "

 "ऊन बहुत उलझते है, कितना सुलझाऊँगी "


"बेटे, जीवन में, जब रिश्ते उलझेंगे तो कैसे सुलझाओगी, जब तुम अभी ही, हार मान ले रही हो

,तो आगे कैसे बढ़ोगी। उलझाना तो होगा, पर हम उपाय ढूढ़े की, उलझना कम हो,हर घर (फंदा )बुनते समय सतर्क रहो,।बड़ी मेहनत से बुना जाता है, तब स्वेटर तैयार होता है. इसी तरह रिश्तों को भी प्यार की ईट से जोड़ कर बनाते है।हर चीज के लिये धैर्य की जरूरत होती है, याद रखना धैर्य से तुम बहुत कुछ संवार सकती हो,।


दूसरा जब तुम प्रयास ही नहीं करोगी तो आगे कैसे बढ़ोगी। आगे बढ़ने के लिये प्रयास बहुत जरुरी है।

तीसरी बात, फंदे गिरने से बचाओ, इसलिये सावधानी से अपना कार्य करो, फंदे गिर जाते है, तो उठा तो लिये जाते, पर वो सफाई नहीं आती, जो बुनने पर आती..."।


       उस समय आधी बात समझी और आधी नहीं समझी, पर स्वेटर बुनने को राजी हो गई, आस्तीन मुझसे बनवाई, पर आगे -पीछे का पल्ला उन्होंने खुद बनाया, स्वेटर सिलना सिखाया। शादी के पहले और बाद में भी वो स्वेटर मैंने खूब पहना। शादी के बाद, स्वेटर बनाने की गूढ बातें, जो जिंदगी के लिये भी सटीक थी, समझ आई।


       पुरानी बहुत चीजें समय के साथ छूट गई, पर वो स्वेटर, से जुडी माँ की शिक्षा मेरे बहुत काम आई, कभी वो स्वेटर, किसी को देने का मन नहीं हुआ,।हाँ बेटी बड़ी हुई तो उसे वो स्वेटर पहनने को दिया, वहीं बातें उसे भी बताई, हो सकता है, उसे भी अभी समझ में नहीं आई, पर जिंदगी के इम्तिहान में उसे समझ में आ जायेगा। पीला स्वेटर आज भी अपने सुझावों की रश्मीयाँ फैला रहा है।


                            ---संगीता त्रिपाठी


  . "सर्दियों की गर्माहट "

#kuch teri meri yaaden sardiyo ki "


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