उत्साह और जोशभरा ग्लेशियर का सफ़र

उत्साह और जोशभरा ग्लेशियर  का सफ़र

युवावस्था में जोश, ऊर्जा और महत्वाकांक्षा उम्र के दूसरे पड़ावों  से ज्यादा होती है इसलिए कठिनऔर बड़े से बड़ा काम युवाओं के हिस्से में आता है। अपनी युवावस्था में हम भी ऊर्जाऔर जोश से लबरेज़ थे। 

बात 1993 की कॉलेज में एक्ज़ाम्स हो चुके थे ।इस बार पर्वतारोहण के लिए फार्म भरा । साहसिक खेल और पर्यटन विभाग उत्तराखंड द्वारा प्रति वर्ष पर्वतारोहरण अभियान  का आयोजन होता है। पर्यटनऔर साहसिक खेलों के लिहाज़ से उत्तराखंड पूरी तरह सुरक्षित है।देशभर से 60 लोगों का चयन इस अभियान के लिए हुआ । अल्मोड़ा शहर से लगभग 20 लोग थे।  सभी परिचित।मैं और मेरी बड़ी बहन भी इस पर्वतारोहण अभियान दल के सदस्य थे। 

2 मई 1993  को हमारी यात्रा कफ़नी-पिण्डारी ग्लेशियर के लिए आरम्भ हुई।  सुबह 7 बजे  सब लोग इकट्ठा हुए और विभाग द्वारा हरी झंडी दिखाकर हमारे पर्वतारोही दल को रवाना कर दिया गया। अल्मोड़ा से बागेश्वर और फिर भराड़ी नामक जगह तक हमने 4 घण्टे का सफर बस से तय किया ।उसके बाद मोटर मार्ग नहीं था।आगे की यात्रा पैदल करनी थी। बस को हमने यहीं छोड़ दिया और पहले दिन 4 किमी की खड़ी चढ़ाई  तय कर लोहारखेत नामक  गांव पहुँचे। यहां टूरिस्ट रेस्ट हाउस में हमें ठहरना था। खाना बनाने के लिए दल के सदस्यों की ड्यूटी  लगती ।10 दिवसीय यात्रा थी इसलिए दैनिक उपयोग की सामान्य वस्तुएं, स्लीपिंग बैग,प्लेट,कटोरा,चम्मच ,ग्लास,पानी की बॉटल और मोमबत्ती-दियासलाई  जैसे बेहद ज़रूरी सामान हमारे ट्रेवल बैग में होते। बाकी सामान दल के लिए खाने इत्यादि का सामान खच्चरों से  ढुलाया जाता। पहले दिन सभी थके थे जल्दी सो गए।

अगले दिन सुबह अगले पड़ाव के लिए निकलना था जो यहां से 8 किमी जंगल से होकर जाती थी इसमें जंगली जानवरों के मिलने का भी डर था इसलिए गाइड द्वारा पहले से चेतावनी  दे दी गई थी कि समूह में जाएं और अपने हाथ में डंडा अवश्य रखें। हर पडा़व के लिए सवेरे निकलना होता था,ताकि दिन रहते पहुँच जाएं।रात में कैम्पफायर होता ।एडवेंचर से जुड़ी विविध प्रतियोगिताएं होतीं। 
   

4 दिन की पैदल यात्रा के बाद हम बेसकैम्प पर थे । गांववालों ने हमे बताया की पिछली रात स्नोफॉल हुआ है। हमारा रोमांच और बढ़ गया इस दिन रात 3 बजे मूव करना था  जिससे सूर्योदय से पहले -पहले हम ग्लेशियर के जीरो पॉइंट पर पहुँचकर  वापिस आ सकें ।नहीं तो सूर्य की किरणों से एवलॉंच का ख़तरा बढ़ जाता है जो बहुत जोखिम भरा होता है।एक्साइटमेंट के कारण नींद नहींआई और हम 2 बजे रात से जाने की तैयारी करने लगे। जोश ऐसा कि क्या बताएं ।

5वें दिन  लगभग 55 किमी पैदल चलकर हम  पिण्डारी गलेशियर पहुँचे ।गाइड ने दल के लीडर को जीरो पॉइंट पर झण्डा फहराने को कहा।हर्ष,रोमांच अपने चरम पर था।और नारों की आवाज़ से वह पर्वत की चोटी गूँज उठी । मुश्किल से 8-10मिनट रूकने के बाद हमें लौटने का संकेत  कर दिया गया ।पर अपनी इस फतेह पर हम सब बहुत ख़ुश थे फिर वही 55 किमी की पैदल यात्रा तय कर हम चौथे दिन वापिस लोहार खेत पहुँचे ।सब सकुशल थे ईश्वर की कृपा से कोई जानमाल की क्षति नहीं हुई थी।

देशभर से आए यात्रियों का ये दल एक परिवार बन चुका था। अगले दिन हम वापिस अल्मोड़ा के लिए लौट रहे थे ।इस साहसिक पर्वतारोहण दल को जहां अपने सफल अभियान की प्रसनन्ता थी वहीं जीवन में फिर कभी सब मिलेंगे या नहीं इस बात का दुःख भी था। कुछ लोगों से फिर कभी मुलाका़त नही हुई पर जहां भी हों सकुशल हों ऐसी मैं कामना करती हूँ।

दोस्तों ये यात्रा बेहद रोमांच से भरी थी।जिसे याद करके आज भी मैं ऊर्जा और जोश से भर जाती हूँ अगर आपको मेरा ये यात्रावृतांत अच्छा लगा हो तो बताइयेगा ज़रूर ।

   

डॉ यास्मीन अली
   

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