#वो अलसायी सी,सर्द सुबह

#वो अलसायी सी,सर्द सुबह

कोहरे की  श्वेत चादर में लिपटी,शबनम की बूंदों से भीगी - ठिठुरती...

कुछ अलसायी,कुछ शरमाईं सी...थी वो सर्दी की सुनहरी सुबह!!!

जब शाखों पर बर्फ के फूल खिले थे...

हड्डियों को भेदती, जड़ीली हवाओं के झोंके भी बहे थे!!

कांपती आवाजों का था शोर...कोई बेच रहा था मलाई मक्खन....

तो कोई कुछ और!!!!!

नरम नाजुक लिहाफ में मैँ पड़ी थी....आलस और सर्दी से दो दो हाथ किये पड़ी थी!!!

तभी कानों में कांपती,महीन आवाज सुनाई दी.....हरे साग ले लो!!!

ना चाहते हुए भी खिड़की के निकट आ खड़ी थी.....

देखा तो  कुछ...नन्ही मासूम कलियां... सर पर गठरी उठाये खड़ी थीं!!!

'मेम साहब...बिल्कुल ताजे हैं...बस अभी ही खेत से तोड़ें है...

खिडकी की तरफ देख,मनुहार किये पड़ीं थीं!!!!

देख कर उनकी स्थिति कालेज मुंह को आ गया...

एक थी नंगे पैर ही....कुछ के तन पर बस एक सूती फ्रॉक थी!!!!

"अरे!! इतनी सर्दी में नंगे पैर,नंगे बदन????

क्या जल्लाद हैं तुम्हारे माता पिता.....और स्वजन??

नहीं,जल्लाद नहीं...मजबूर हैं हालातों से,

इसीलिए उठायी है ये गठरी हमने हाथों में!!!!

दो पैसे मिल जाएंगे तो पिता की आ जायेगी दवाई...

माँ ने तो पहले ही...अपनी जान गंवाई!!!!

उस सुनहरी सुबह की किरणों में चेहरा उनका दमका था!!!

आशा की चमकीली किरणों से.....मन कमल भी महका था!!!

लेकर उनके साग सभी.. पैसे और गर्म कपड़े पकड़ाए थे... 

उनके मुख की सुनहरी चमक के समक्ष....

सूर्य की किरणें भी शरमाई थीं!!!!

शुभ हो गया मेरा दिन.... और सुनहरी हो गयी वो सुबह

#जनवरीकीकविताएं

#वो सुनहरी सुबह


 

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