वो बंजारापन, जो हमेशा याद आये! Blog post by Sangita Tripathi

वो बंजारापन, जो हमेशा याद आये! Blog post by Sangita Tripathi

सर्दियों का मौसम, मतलब मौज, मस्ती, पिकनिक, सैर सपाटे का मौसम। ना तो गर्मियों की गर्म हवा, ना पसीने की चिपचिपाहट, ना सूर्य देवता की आग उगलते गुस्से का सामना,..। मुझे और मेरे परिवार को सर्दी का मौसम ज्यादा भाता है।


पति की पोस्टिंग जहाँ थी, वहाँ से मध्यप्रदेश पास था। दिसंबर का महीना आते ही, पिकनिक का दौर चालू हो जाता था। एक ट्रिप मै भूल नहीं पाती जो अचानक, सरप्राइज के रूप में थी।एक दिन पति, ऑफिस से घर आये बोले -सुबह ही हम मध्यप्रदेश घूमने चल रहे..।कहाँ जाना, पहले से निश्चित नहीं..।हाँ हमारे साथ एक परिवार और चल रहा, पर वे अपनी कार से चलेंगे..।


"इतनी जल्दी तैयारी कैसे होंगी,"मै घर को बंद करने, यात्रा की तैयारी और बच्चों के होमवर्क के तनाव से ग्रस्त हो बोल पड़ी।

"सब हो जायेगा, बस कपड़े ही रखना है "कह पतिदेव अख़बार की ख़बरें पढ़ने लगे, और बच्चे... "हिप- हिप हुरे " करने में..। पति का निर्णय जानती थी, कोई चारा ना देख, तैयारी में लग गई। एकल परिवार होने से, फ्रिज बंद करने और सब्जियों को पड़ोसी के यहाँ पहुंचाने का कार्य आरम्भ कर दिया। हम जहाँ रहते थे वहां सब्जी बाजार हफ्ते में एक ही दिन लगता था। हफ्ते भर की सब्जी उसी दिन खरीदनी होती थी..।अतः कहीं बाहर जाते समय हम पड़ोसियों को अपनी सब्जी या फल दे जाते थे, सब्जी की किल्लत थी,तो हम सब ख़ुशी खुशी,सब कुछ शेयर कर लेते थे। वहाँ सब्जियां महंगी भी मिलती थी।


अगले दिन सुबह पांच बजे उठी, देख कर हैरान रह गई, जो बच्चे चीखने -चिल्लाने पर जल्दी नहीं उठते थे, वे नहा -धो कर रेडी थे। अपने गेम, खिलौने,बुक्स ले अपना बैग रेडी कर लिया , आश्चर्य चकित हो मै भी फटाफट तैयार हो गई, और निकल पड़े, उस समय हमारे पास मारुती 800 कार थी। पोस्टिंग वाली जगह से कहीं आने जाने के साधन कम थे, अतः हम सबकी कार यात्रा खूब होती थी।


 कार में बैठते ही, बच्चों ने टेप पर कैसेट डाला, उन दिनों कैसेट ही चलते थे, पेन ड्राइव का जमाना नहीं था। कोई भी यात्रा शुरू करने से पहले, हम सब" जय बजरंग बली की जय "जरूर बोलते थे।


जैसे ही इन्होने कार स्टार्ट की," बजरंग बली की जय "तेज आवाज आई, देखा बेटा जोश में चिल्ला रहा।और हमारे दोस्त के बच्चे भी उसका साथ दे रहे।हम सब भी बजरंगबली का नाम ले आगे बढे। हम सबसे पहले मध्य प्रदेश के बांधव गढ़ पहुंचे।बच्चे शेर देखने के नाम से बहुत उत्साहित थे।


शाम हो गई थी, तो अगले दिन चार बजे सुबह, का टिकट लिया गया और जीप बुक की गई, जो जंगल में ले जायेगी। हम लोग मध्यप्रदेश टूरिज्म के होटल में रुके थे। रात लाइट चली गई, मच्छरों ने परेशान करना शुरू किया, दिन भर की थकान, ठण्ड और ऊपर से लाइट ना होना, हमें परेशान कर रहा था, तभी बगल के कमरे से मित्र के बेटे की आवाज आई "-मम्मी मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा, मै अंधा हो गया हूँ," जोर से रोने लगा,हम सब घबरा गये।तभी लाइट आ गई," अरे मम्मी मेरी ऑंखें ठीक हो गई।"उसकी बात सुन हम सब को हँसी आ गई।


सुबह हम जीप में बैठ,जंगल,शेर देखने गये, रात्रि का सन्नाटा, हर आहट पर शेर दिखने की उम्मीद,, तभी घने जंगल में हमारी जीप ख़राब हो गई। जीप ओपन थी, ठण्ड भयंकर थी, अब ठण्ड के साथ डर लगने लगा, ड्राइवर बार -बार जीप स्टार्ट करने की कोशिश करें पर घर्र घर्र कर जीप रह जाती। हम दोनों परिवार एक ही जीप में थे, ड्राइवर से बाहर निकलने का रास्ता पूछा तो बताया करीब दो किलोमीटर है..।उसने हमें जीप के बाहर उतरने से मना कर दिया।हम चुपचाप जीप में बैठे थे, तभी मेरा बेटा बोला -सब लोग चुप रहो, देखो शेर की आवाज आ रही..। हमने भी ध्यान लगाया, कोई आवाज तो आ रही थी, इधर -उधर देखा तो कुछ नहीं दिखा। तभी पति की निगाह ड्राइवर के बगल में बैठे गाइड पर गई, जो खुर्राटे ले कर सो रहा था। और उसके खुर्राटे शेर की गुर्राहट की तरह लग रहा था।पति ने इशारा किया, हम सब कुड़कूड़ाते हुये भी जोर से हँस पड़े। धीरे -धीरे उजाला फैलने लगा। एक और जीप उधर आई, उसमें बैठे लोगों ने पूछा -शेर दिखा..। पति ने जवाब दिया -आवाज सुनी थी। सबका हँसते -हँसते बुरा हाल था। दूसरे जीप वाले की मदद से हम,बिना शेर देखे होटल लौट आये..।होटल आ सबसे पहले खाने पर टूट पड़े हम सब,।पर आज भी किसी भी जंगल में सफारी के लिये जाते, वो सफारी हमेशा याद आती,,, जहाँ ठण्ड, और डर के बावजूद हमने जो लम्हें बितायें, वो बिना शेर देखे भी अविस्मरणीय बन गया..।


 बाद में हम वहां से खुजराहो, पंचमढ़ी और मैहर देवी के दर्शन कर पंद्रह दिन के ट्रिप के बाद,इक्कतिस दिसंबर को घर वापस आ गये। पर जीवन के खूबसूरत लम्हों को अपनी पोटली में संजो कर, उस दोस्त और उसकी फैमिली से वर्षो हो गया मुलाक़ात हुये, पर स्मृतियों में आज भी वो प्यारे पल इस तरह है, जैसे कल की बात हो...।वो बनजारों की तरह, सामान उठा, कभी भी, कहीं भी चल देना, अक्सर याद आता है..।अब तो योजना बना कर जाना पड़ता, होटल भी पहले से बुक करना पड़ता। पहले तो अचानक योजना बनी, सामान रखा, निकल पड़े ट्रिप पर, कभी अकेले तो कभी दोस्त संग..।


 ---संगीता त्रिपाठी 


#सर्दियों की गर्माहट..

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