वो चोरी

वो चोरी

तब हम सभी संयुक्त परिवार में रहते थे।करीब दस बारह भाई बहन,मतलब चाचा ताऊ के बच्चे?फिर गर्मी की छुट्टियां।करीब एक किलोमीटर की दूरी पर आम का बगीचा हुआ करता था।


ऐसे ही एक रविवार को जब सभी बड़े भी घर में थे,लेकिन भारी खाने के कारण सभी दोपहर में सो गए थे, हम बच्चों को नींद नहीं सुहाई।धीरे धीरे गलियारे से एक एक कर सारे बगीचे की ओर भाग गए। पेड़ पर चढ कर खूब सारे आम खाए,छोटे बच्चो को नीचे ही फेंक कर दे दिए।जब मन भरा ही था की बाग का माली नींद से उठ कर दोडा दोड़ा हमारी तरफ आता दिखा। 


हम एक के ऊपर एक गिरते हुए दोड़ लगाकर घर के पिछले हिस्से की ओर भागे।भागते भागते बड़ा भाई नाली में गिर गया।उसे उठाकर पीछे के दरवाजे से सभी अन्दर आ गए।ओर ऊपर ओसारी में जाकर छुप गए।बगीचे का मालिक दादाजी का दोस्त था।उसने आगे की तरफ से आकर हमारी शिकायत दादाजी को कर दी। हमें बुलाया गया ,हमने शुद्ध झूठ बोल दिया हमतो सो रहे थे।


दादाजी ने उलटी डांट माली को लगाई,ओर अपने दोस्त को बुलाकर शिकायत की, कि मेरे बच्चो की झूठी शिकायत लेकर आया इसे कहो काम के समय सोया ना कारे।ये तो में छोड़ रहा हूं वरना नींद में न जाने किस किस से लड़ाई करता होगा।समझा लो अपने माली को।


उनके दोस्त ने उस माली को खूब खरी खोटी सुनाई।ओर दोनों चले गए।फिर दादी अन्दर आई।जब उन्होंने नाली के कीचड़ वाले पैरो के निशान देखे तो हमारी क्लास लगा दी।हमारा झूठ पकड़ा गया।


अगले दिन दादी खुद हम सभी को लेकर बगीचे गयी वहां की पूरी सफाई हमसे करवाई।ओर माफी भी मंगवाई।

आज भी जब सभी इकट्ठे होते है तो ये किस्सा यूं ही हमे गुदगुदाता है?।खेर अब ना बचपन है,ना वो बगीचा न दादा दादी,बस बाकी है वो खट्टी मीठी यादें?।


#खट्टी मीठी यादें

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