#विजय दशमी

#विजय दशमी
किया था विनाश श्रीराम ने रावण का,
अनेकों बुराइयां जलकर भष्म हो गयी थी।
आया था धरा पर रामराज्य और धर्म की,
दीपमालाएं प्रज्ज्वलित हो उठी थी।

जलाते है हम हर साल रावण के पुतले को,
फिर भी समाज में व्याप्त बुराई है।
मद,मोह,ममता और तम रूपी रात्रि में,
अस्तित्व हीन दिखाई देती अच्छाई है ।

बाह्म रावण को छोड़कर क्यों न हम,
अपने अंदर पनपते हुए बुराई का नाश करें।
त्याग कर अधर्म के पथ को,
धाम का अनुशरण करें।

छल,कपट,पाखण्ड को छोड़कर,
समाज में व्याप्त भ्र्ष्टाचार और व्याभिचार को मिटाएं।
कामुक भेड़ियों की बलि चढ़ती हुई,
देश की कई निर्भया जैसी बेटियों को बचाएं।

बेटों की तरह बेरियों को भी साक्षरता
का ज्ञान दिलाएं,
और समाज में बेटों और बेटी के,
भेदभाव को मिटाएं।


मन में व्याप्त अज्ञान के अंधकार को नष्ट कर,
ज्ञान का दीपक जलाएं।
अहंकार के रावण को मारकर,
विनम्रता का पाठ पढ़ाएं।

जाति-पांति, ऊंच-नीच के भेदभाव को,
मिटाकर "सर्वे भवन्तु सुखिनः"का भाव बनाएं।
प्रेम,स्नेह, सौहार्द से विजय दशमी का
पावन पर्व मनाएं।।

स्वरचित एवम मौलिक

अक्षरा द्विवेदी
उत्तर प्रदेश "उरई"

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