विलुप्त होती हमारी परंपराएं (Indian Culture)

विलुप्त होती हमारी परंपराएं (Indian Culture)

भारत की पहचान है यहां की सभ्यता , यहां की संस्कृति... जैसे भगवान की पूजा उपासना करना ,साड़ी पहनना ,सर पर पल्लू रखना, अपने से बड़ों को पैर छूकर प्रणाम करना और हर महीने कोई ना कोई त्योहार मनाना भारतीयों की पहचान है। ये सारे रीति रिवाज़ भारत की संस्कृति का अभिन्न अंग है और भारतीय इन्हीं रीति-रिवाजों को पीढ़ी दर पीढ़ी अपने बच्चों को सौंपते हैं या अपने बच्चों से अपेक्षा रखते हैं कि वो भी उनकी तरह उनके रीति रिवाज़ ,उनकी परम्पराओं का सम्मान करें और उसे आगे बढ़ाएं।

पर आज समय बहुत बदल गया है लोग अपनी जिंदगी में अपने काम में इस कदर व्यस्त हो गए है कि उन्हें अपने परिवार के साथ समय बिताने का भी समय नहीं है ऐसे में वो अपने पूर्वजों के रीति-रिवाज या उनकी परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए कैसे समय निकाल पाएंगे!!! 

आज समय के साथ बहुत सारे बदलाव देखने को मिल रहे हैं, कुछ लोग इस बदलाव को सहर्ष स्वीकार कर रहे हैं तो कुछ इस बदलाव को नापसंद कर रहे हैं।


मैं बिहार से हूं और हमारे यहां भी रीति रिवाज को बहुत महत्व दिया जाता है। आज मैं अपने क्षेत्र की एक ऐसे रीति-रिवाज की बात करना चाहूंगी जो समय के साथ कहीं खो गया है।


हमारे यहां एक रिवाज है बेटी की शादी में घर के आंगन या छत पर मड़वा ( मंड़प) गाड़ने का जो शादी के एक दिन पहले होता है। जब मड़वा गाड़ते हैं तो घर ,परिवार के लोगों के साथ साथ संगे संबंधी भी इस रिवाज का हिस्सा बनते हैं।

अगले दिन इसी मड़वा के अंदर शादी होने के पहले हल्दी - कलश, लड़की को दूब हल्दी चढ़ना और घृतढारी की विधि की जाती है। उसके बाद उसी मड़वा में लड़की का कन्यादान होता है और दो अंजान लोग विवाह बंधन में बंध जाते हैं। लड़की की विदाई के बाद आंगन या छत पर गडा़ हुआ वो मड़वा सवा महीने तो कहीं छ महीने तक भी गड़ा रहता है। बेटी की विदाई के बाद माता-पिता मड़वा को देख भावुक होते रहते हैं और यदि कोई अंजान व्यक्ति घर में आए तो मड़वा देखकर उसे भी पता चल जाता है कि घर में अभी अभी शादी हुई है।


मैं ये सब इसलिए बता रही हूं कि आज समय की कमी और दिखावे या फैशन की वज़ह से मड़वे का रिवाज विलुप्त हो गया है।आज सब के पास पैसे जरूर हैं पर उनके पास समय की कमी हो गई है।अब सब लोग अपनी बेटी या बहन की शादी घर से करने के बजाय विवाह भवन , रिसॉर्ट या होटल से करना चाहते हैं और इसी वजह से वे लोग एक दिन में ही शादी की सारे रीति रिवाज़ को निपटा देना चाहते हैं।

आज मड़वा नहीं रेडीमेड मंड़प का जमाना है बस कुछ घंटे पहले तैयार करो और विवाहोपरांत फटाफट हटा दो। नए जमाने के इस मंड़प से ना तो लड़का लड़की खुद को जुड़ा हुआ पाते है और नाही माता-पिता ही उस मंड़प से कोई लगाव महसूस कर पाते हैं । 


ये मेरी व्यक्तिगत सोच है मैं ये नहीं कहती की समय के साथ नहीं चलना चाहिए या खुद को समय के साथ नहीं बदलना चाहिए पर जहां तक संभव हो खुद को जमीं से जुड़ा हुआ रखना चाहिए ताकि हम अपने पूर्वजों के द्वारा बनाए हुए परम्पराओं को बढ़ा सकें और उसका मान सम्मान कर सकें। हमारी परम्पराएं, हमारे रीति-रिवाज ही तो हैं जो हमें दूसरे देशों से अलग बनाती हैं तो फिर हम कैसे अपनी पहचान को खो सकते हैं या समय की कमी के कारण कैसे विलुप्त होता देख सकते हैं।

सोचिएगा जरूर की हम अपनी पीढ़ी को अपनी परंपराओं के बारे में क्या बताएंगे और उन्हें आगे बढ़ाने के लिए क्या सौंप कर जाएंगे।


#मेरीपसंद

 

 

 

 

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