वन्दिता#बसअबऔरनही

वन्दिता#बसअबऔरनही




"मिस बन्दिता " ? टीटी ने टिकट चेक करते हुए वन्दिता से पूछा।बन्दिता नही सर वन्दिता ! वन्दिता ने अपने नाम के " व " पर जोर देते हुए कहा।जैसे सारी दुनिया को बता देना चाहती हो वो कभी "बन्दिता" नही हो सकती ! वह वन्दिता थी वन्दिता ही रहेगी !


ट्रेन की गति के साथ ही उसके विचारों ने भी गति पकड़ ली । पिछले छः महीने चलचित्र की भाँति सामने घूमने लगे।



प्यारी सी वन्दू माँ पापा की लाडली सन्तान थी। नाजों पली वन्दू के लिए उसके पापा ने शहर के रईस खानदान का लड़का ढूँढा । मोहित अपने नाम के अनुरूप ही मनमोहक था।खुद कस्बे में रहते थे तो सोंचा लड़की शहर में ही ब्याहनी चाहिए । एमबीए की हुई हॉस्टल रहकर पढ़ी लिखी वन्दिता के लिए जब शहर के नामी वकील के बेटे का रिश्ता आया तो ऊपरी जाँच पड़ताल कर चट मंगनी पट ब्याह वाली उक्ति उसके जीवन में चरितार्थ हुई।



प्रणय मिलन की रात आँखो में हजार सपने लिए वन्दिता मोहित का इंतजार कर रही थी।मोहित आया पर शराब के नशे में धुत्त ! बिना उसके कुछ पूछे ही लहराती जबान में अपनी जिंदगी का सच उगलने लगा -"वह एक लेस्बिगेय है" ! उसे औरत नाम की जाति में कोई इन्ट्रैस्ट नही ! अपने पापा के कहे पर शादी की और वो रैस्ट्रिकेटेड वकील हैं ।घोटाला करके फंसे हुए हैं।

खबरदार जो कोई भी बात घर के बाहर निकली,,,,मेरा बाप जरूर वकील है पर मेरी पहुँच नामी गुण्डों से लेकर शहर के आईपीएस तक है।50लाख में तू आई पापा का केस 30लाख में टला है।



हाय री किस्मत ! कहीं ज्यादा तो नही पी ली या किसी पिक्चर के डायलाग हैं ये। अगले दिन से घर और घरवालों का रवैया देखकर वन्दिता समझ गई कि वह फंस चुकी है।


एक महीने ,दो महीने ,पाँच महीने आखिर कब तक वह खुशी का मुखौटा पहनती मायके वालों के सामने और खुद अपनी आत्मा पर ! जब उस रात अपने दोस्त के साथ दारू पीकर कमरें में बंद हुआ मोहित ,,,,,,तो निकल पड़ी वन्दिता अपने आँसुओं को पोछकर इस दृढ़संकल्प के साथ "बस अब और नही"


!स्वलिखित -सारिका रस्तोगी?

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