वजूद

शहर के शोर-शराबों के बीच एक ऐसा दिल धड़क रहा हैं, जिसकी ख्वाहिशें हजार हैं पर साथ कोई नहीं। ख्वाहिशों का सफर लिये पिनाकी दिल्ली आ पहुंची, सुन्दरता की लड़ी लिये जब भी गलियों से निकलती लोग उसकी खूबसूरती के कायल हो जाते, मगर उसकी कशिश तो कहीं ओर ही थी नाम था मुन्ना, पेशे से ऑटोचालक है

वजूद

शहर के शोर-शराबों के बीच एक ऐसा दिल धड़क रहा हैं, जिसकी ख्वाहिशें हजार हैं पर साथ कोई नहीं। ख्वाहिशों का सफर लिये पिनाकी दिल्ली आ पहुंची, सुन्दरता की लड़ी लिये जब भी गलियों से निकलती लोग उसकी खूबसूरती के कायल हो जाते, मगर उसकी कशिश तो कहीं ओर ही थी नाम था मुन्ना, पेशे से ऑटोचालक है, पिनाकी रोज चोरीछिपे ऑटो साफ करते हुए उसकी हल्की सी मुस्कान के साथ जब भी मुन्ना को देखती, उसकी दिलों की धड़कन तेज हो जाती, मानों मन ही मन पिनाकी मुन्ना को दिल दे बैठीं हो।

एक सुबह जब पिनाकी घर से जैसे ही निकलने लगी, वहां राधा आ पहुंची और पूछने लगी कहां चली ऐसी सज-धज कर, पिनाकी- कहीं नहीं बस नीचे टहलने जा रही हूँ। राधा- मुझे सब समझ आता है! तूने सोचा भी है कि जिस दिन तेरी सच्चाई उसे पता चलेगी तो कौन तुझे अपनायेगा? पिनाकी साथी हर कोई चाहता है लेकिन हमें कोई नहीं स्वीकारेगा, नींद से जाग ये दुनियां हमारे लिए नहीं बनी है। हमारी गुरु मां भी हमेशा से यही कहती है, जिन्हें उनके अपनो ने निकाल फैंका तो गैरों से क्या उम्मीद रखें।

पिनाकी गुस्से से बाहर निकल कर, समुद्र किनारे सन्नाटे के बीच में सोचती हुई "हे ईश्वर ये कैसा अभिशाप है, हम सजीव तो है मगर हमारी जिंदगी किसी निर्जीव से कम नहीं, सीने में दिल तो है मगर धड़कन नहीं, खूबसूरती तो दी मगर तारीफ के हकदार नहीं, हाथों में लकीरें तो दी मगर किस्मत में सुख भोगने का हक नहीं.." समुद्र की उफनती लहरें और सन्नाटों ने पिनाकी का मन तो हल्का किया मगर अब भी सवाल वहीं..... पिनाकी घर जानें को ट्रेन में सफर कर रही थी, तभी उसनें देखा दूर बैठा एक नौजवान उसकी ओर घुर के देख रहा है, और उसके हावभाव देख रहा है. काफी देर देखने के बाद वह नजदीक आया और बोला तुम बहुत खूबसूरत हो, ट्रेन रूकी और पिनाकी उतरी और कहने लगीं तुम्हें पता भी है मैं कौन हूँ? मैं एक किन्नर हूं.... और ट्रेन अगले स्टेशन के लिए निकल पड़ी।

नौजवान- चिल्लाते हुए..... तो इसका खूबसूरती से क्या वास्ता?...
पिनाकी मुस्कुराते हुए ..... मानों किसी ने उसके सवालों के जवाब दे दिया हो और खुशी से झूमती हुईं  घर को निकल पड़ी और अगली सुबह दोबारा से मुन्ना के ख्यालों में और रोज की तरह उसे ऑटो साफ करते हुए झांकने लगी, तभी मुन्ना ने उसे देख, पकड़ लिया और पूछते हुए कि क्या हुआ, क्यू ऐसे चोरी छूपे रोज देखती है? पिनाकी- तुम्हारी मुस्कान के लिए और अपना फॉन नम्बर थमाते हुए दौबारा घर की ओर भाग जाती हैं।

शाम को मुन्ना ने जैसे ही घर आकर उसे फॉन किया, पिनाकी की तेज धड़कने मानों सबकुछ बयां कर दिया हो, पिनाकी ने दिल की सारी बात बताते हुए, सवाल किया कि क्या तुम भी मुझे औरों की तरह केवल एक किन्नर मानते हो, जिसका कोई वजूद नहीं? मुन्ना- तू सच में बहुत खूबसूरत है, और इस संसार के रचियता ने सभी को समान अधिकार दिये है, तुम्हारा तो नाम भी पिनाकी है जो कि भगवान शिव का रूप है, जिन्हें पूरी दुनियां अर्द्धनारीश्वर के रूप में जानती है, तो भला तुम अलग कैसे? इंसानों ने नियमों को बनाया है ईश्वर ने नहीं, और अब तो सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार तुम्हारी सप्रदाय को भी स्थान दिया है तो तुम्हारा वजूद तुम्हारी ख्वाहिशें तुमसे कोई नहीं छीन सकता, उस दिन से हर रोज पिनाकी और मुन्ना की फॉन पर बातें होने लगी।

 उम्मीद करती हूँ आप सभी को मेरी यह कल्पना पसन्द आये, मेरे कुछ पाठक सोचेंगे कि मैंने ये कैसा विषय लिया लेकिन मैं आप सभी को यही कहना चाहती हूं कि भावनाएं और ख्वाहिशें सभी के मन में होती है, बस कमी है तो हमारी सोच और समझ की, अगर हम हमारे बच्चों को यह बताये कि सभी बराबर है किसी में कोई कमी नहीं, कोई काला-गौरा नहीं, हर ट्रांसजेंडर भी इंसान हैं उनका भी सम्मान करें। क्योंकि आज कई ट्रांसजेंडर ने वो मुकाम हासिल किया जिससें वो बरसों से वंचित थे, इस महामारी के समय में भी कई किन्नरों ने जरूरत मंदों को राशन और पैसों की सहायता की है, देश के इस विकट स्थिति में भी वह हम सभी के साथ खड़े है, तो हमारा भी यह कर्तव्य हैं कि हम उन्हें उनका वास्तविक अधिकार दें। चंद पंक्तियां उनके लिए :-

"यूँ तो वे हमारे ही समाज अनचाहे अंग हैं

हर ख़ुशी में शामिल वे हमारे संग संग हैं।

प्रकृति की अजीब विडम्बना देखो यारो

छोड़ दिया जिनको अपनों ने,समाज ने

हिजड़े नही हैं वो, अब तृतीय लिंग हैं

कैसा दर्द है,स्वीकृत होकर भी,अस्वीकृत है,

सभ्य समाज से वे आज भी बहिष्कृत हैं,

लेकिन बिना उनके प्रदर्शन के सभी ख़ुशी अधूरी हैं,

शादी ,विवाह,गृहप्रवेश पर जिनसे ही जमता रंग है

कोई और नही हैं वो,दिखते तो हमीं जैसे

किन्तु फिर भी तृतीय लिंग हैं,फिर भी तृतीय लिंग हैं।”

 मेरी लिखावट में अगर कोई त्रुटि हुई हो तो मुझे माफ करें।

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