वो चाय वाले अंकल

वो चाय वाले अंकल

स्नेहा आज भी खिड़की से बाहर ढूंढ रही थी उन्हें। पर जाने क्यों कहीं दिखाई नहीं दिए स्नेहा शादी के बाद पहली बार अपने पति के साथ ट्रेन से मायके जा रही थी। तभी प्लेटफार्म से गरम गरम चाय लेकर अनिरुद्ध (स्नेहा के पति)आए।

“यह लो स्नेहा !कितनी ठंड पड़ रही है और देखो चोपन स्टेशन भी कितना सुनसान है “अनिरुद्ध बोले।
“थैंक्स अनिरुद्ध ( चाय लेते हुए), हां चोपन वैसे अधिकतर इतना खाली स्टेशन नहीं रहता। मगर ठंड है ना”स्नेहा ने कहा।

अनिरुद्ध-“हां,….एक बात बताओ स्नेहा,तुम इस ट्रेन से सफर कैसे करती थी लखनऊ से सिंगरौली? उफ्फ खाली ट्रेन में! डर नहीं लगता था?”
स्नेहा(हंस के)-” डर! नहीं तो, मेरी friends रहती थीं चोपन तक।उसके बाद तो बस २-३ घंटे की बात होती थी।( कुछ सोच कर)
सच कहूं,पापा ने हमेशा मुसीबत में हिम्मत रखना सिखाया पर न्यूजपेपर में crime against women ,पढ़ के मां डरती थी, और कभी कभी मैं भी।”
अनिरुद्ध-” फिर कैसे करती थी?”

स्नेहा-” जानते हो,इस ट्रेन में एक चाय वाले अंकल बैठते थे चोपन से,इतनी अच्छी और टेस्टी चाय बनाते थे , सुबह की चाय अंकल से लेती थी,और जाने कितनी चाय पी लेती थी।( थोड़ा रुक कर) इस coach में मुश्किल से ३-४ स्टूडेंट्स ही रह जाते थे चोपन के बाद, या कभी कभार कुछ फैमिली होती थी।पर जाने क्यों वह अंकल के कोच में होने से बहुत सुरक्षित महसूस करती थी।”

अनिरुद्ध-” तो तुम्हें अनपढ़ आदमी से हिम्मत मिलती थी?”
स्नेहा-” हम्म, क्योंकि शिक्षित समाज के कुछ लोग तो लड़कियों को ऐसे देखते हैं जैसे लड़कियां उनकी जागीर हों।
और एक तरफ वह गरीब चाय वाला इंसान जो शांति से नजरें नीचे रख के चाय देते थे,,।”
Sneha-” मेरी नजरें आज भी उनको दूढ़ती हैं,तब आभार प्रकट ना कर पाई जाने कौन थे कहीं फरिश्ता तो नहीं जो हम स्टूडेंट्स को सुरक्षा देते हों।”
और दोनों मुस्कुरा दिए।।

ऐसा शायद सबके साथ कभी हुआ हो।किसी अनजान व्यक्ति के होने मात्र से आप सुरक्षित महसूस किए हों।अगर है तो आप भी सांझा करें।ये मैंने मेरे वाक़िए को कहानी का रूप दिया है ।

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