ये कैसा चलन है संसार का!!

ये कैसा चलन है संसार का!!

उम्र बिता दी मैंने हर रिश्तों को परखने में

और समय बिताया मैंने अपने

किरदार को समझने में।

मैं खुशनसीब हूं जो अपने हर

किरदार को बखूबी निभाती हूं

मजबूरी से नहीं दिल से इसे अपनाती हूं।

कभी बेटी ,कभी बहू ,तो कभी पत्नी,

तो कभी मां बनकर मैं इतराती हूं।

पुरूष, औरतों की तरह खुशनसीब नहीं होते,

अपने हर किरदार को दिल से निभाने के लिए

मर्द ,औरतों की तरह सहनशील नहीं होते।

ये ईश्वर का दिया आशीर्वाद है ,

हर स्त्री इस संसार में एक वरदान है।

फिर क्यों सदियों से बस औरतों के 

चरित्र और आचरण पर ऊंगली उठाया जाता है

क्यों हर बार उनसे ही अग्नि परीक्षा देने के लिए 

कहा जाता है।

ममता और त्याग की मूरत

मानी जाने वाली स्त्री को ही क्यों 

बार बार रूलााया जाता है

ये कैसा चलन है संसार का 

क्यो पुरूष और स्त्री में अंतर किया जाता है

दोनों एक समान है फिर भी उनमें भेदभाव किया जाता है।

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