ये कैसा सम्मान?#BreakTheBias

ये कैसा सम्मान?#BreakTheBias

बात बहुत पुरानी है, उस समय की जब मेरे विवाह को कुछ ही माह हुए थे। जब मैं छोटी थी तब अपने मायके में मम्मी चाची आदि को सिर पर पल्लू रखते देखा था लेकिन समय के साथ मेरे बड़े होते होते वह पल्लू प्रथा भी समाप्त हो गई थी। ससुराल भी आधुनिक था, और यहाँ भी सिर पर पल्लू रखने की कोई बाध्यता नहीं थी, न ही अन्य प्रकार की बंदिशें ही थीं कि यहाँ मत बैठो, बड़ों के सामने बिस्तर पर मत बैठो आदि। परन्तु फिर भी विवाह के प्रारंभिक वर्षों में किसी रिश्तेदार के आने पर मैं स्वयं ही उनके सामने इस प्रथा का निर्वहन कर लेती थी क्योंकि इस बात को पैंतीस वर्ष से ऊपर हो चुके हैं और तब सामान्य घरों में नई बहुओं से सिर ढकने की अपेक्षा की ही जाती थी। लेकिन एक दिन ऐसी घटना घटित हुई कि मैं असमंजस में ही पड़ गई कि मुझे क्या करना चाहिए।


हुआ यों कि मैं उस दिन घर पर अकेली थी। मेरी दोनों अविवाहित ननदें अपने अपने कॉलेज, डॉक्टर पति हॉस्पिटल, पापाजी अपने ऑफिस तथा मम्मी जी किसी पड़ोसी के घर कीर्तन में गई थीं। अचानक डोरबेल बजी तो मैंने दरवाजा खोला। सामने एक अजनबी स्त्री पुरुष खड़े थे। उनकी बड़ी उम्र को देखते हुए मेरा पल्लू तो झट सिर पर पहुँच गया था, परंतु उन स्त्री के सिर पे तो पूरा घूँघट ही था, नाक से भी नीचे। मैंने उन्हें नहीं पहचाना और प्रश्नवाचक दृष्टि से उनकी ओर देखा तो वह पुरुष बोले

"तुम अर्चना हो न?"


मैंने हाँ में सिर हिलाया तो वह अपना नाम बताते हुए बोले


"तुम हमें नहीं पहचानती होगी हम तुम्हारी शादी में नहीं आए थे। हम तुम्हारे चाचा और ये चाची हैं।"


इस परिचय के साथ ही मैं फौरन समझ गई कि वह मेरे ससुर जी के रिश्ते के वह भाई थे जो कि एक ही शहर में रहते हुए भी विवाह में इसलिए सम्मिलित नहीं हुए थे कि पापाजी उन्हें स्वयं उनके घर जाकर निमंत्रण पत्र नहीं देकर आए थे। यह बात मैंने भी सुन रखी थी।


मैंने उनके पाँव छुए, उन्हें सादर अंदर बुलाया और बताया कि फिलहाल घर पर कोई नहीं है पर मम्मी जी आती ही होंगी। तब तक आप लोग बैठिए।

चाचाजी तो बैठ गए, लेकिन चाची जी बाथरूम की ओर दौड़ीं, मुझे लगा कि उन्हें फ्रेश होना होगा लेकिन आशा के विपरीत वह लौटीं तो उनके हाथ में लकड़ी की वह चौकी थी जिस पर बाथरूम में घर के सब लोग बैठ कर नहाया करते थे। मैं कुछ समझ पाती कि वह चौकी डालकर एक ओर बैठ गईं। मैं हतप्रभ थी। मैंने ऐसा करते हुए इससे पूर्व न ससुराल में और न ही मायके में किसी को देखा था।


वह तो अच्छा था कि मुझे इतनी सद्बुद्धि रही कि मैं चाची जी की प्रतीक्षा करते अभी तक खड़ी ही थी, चाचाजी के सामने वाली कुर्सी पर बैठ नहीं गई थी।

अब चाची जी ने मुझसे भी बैठने के लिए कहा परन्तु मैं सोच में पड़ गई थी। अब जब चाची सास सामने चौकी पर बैठी हों तो कुर्सी पे बैठ जाना मेरे संस्कारों के खिलाफ था और दूसरी चौकी लाकर उस पर बैठने के लिए मैं खुद को किसी कीमत पर नहीं तैयार कर सकती थी। वैसे इस हिसाब से तो मुझे उससे भी नीची चौकी अपने लिए ढूँढनी चाहिए थी, या जमीन पर ही आसन बिछा लेना चाहिए था। पर ये मेरे बस की बात नहीं थी। हमेशा स्त्री पुरूष की समानता की बातें जिस मस्तिष्क में सदा चलती रही हों वहाँ बड़ों के प्रति सम्मान तो पूरा था, सम्मान देने के लिए यथासंभव सिर पर पल्लू जैसे छोटे छोटे प्रयत्न बिना बाध्यता भी करती थी। (यद्यपि मेरी खुद की सोच सदा से यही है कि सम्मान तो नजरों से होता है, बोलचाल और हावभाव से होता है, संस्कारों से होता है। पर्दा करने वाले भी अक्सर अपने बड़ों के लिए मुख से अपशब्द निकालने से नहीं चूकते) परंतु आँखें मूँद कर उनका अनुसरण करते हुए ऐसा समझौता नहीं कर सकती थी लिहाजा मैंने खड़े रहने का फैसला किया।

जब दोबारा मुझसे बैठने के लिए कहा गया तो \"मम्मी जी को खबर करवाती हूँ आपके आने की\" कह कर मैं उन्हें देखने बाहर खिड़की तक चली आई। तब मोबाइल तो दूर लैंडलाइन फोन भी सब घरों में नहीं थे, वरना फोन करके ही बुला लेती। परंतु कीर्तन समाप्त हो चुका था और मम्मी जी दूर से दिखाई दे गईं। मैंने हाथ के इशारे से बुलाया और कुछ ही देर में वह आ भी गईं। मेरी जान में जान आई और मैं मेहमानों के लिए चाय नाश्ते के प्रबंध में लग गई।

उसके बाद से जब भी उनका आना होता मैं पाँव छूती, खड़े खड़े बात करती और नाश्ते आदि का प्रबंध करने के बाद अपने कमरे में ही चली जाती।

समय के साथ उनमें भी कुछ कुछ बदलाव आया, शायद घुटनों का दर्द भी बढ़ा होगा और उन्होंने चौकी पर बैठना छोड़ दिया। उनका पल्लू भी छोटा होते होते कंधों तक आ गया। अब भी कभी कभी मिलती हैं तो मैं उनके बराबर में सोफे पर ही बैठती हूँ और अपनी इच्छानुसार कपड़े भी पहनती हूँ।


कुछ रिश्ते ऐसे भी होते हैं जहाँ किसी रूढ़ि या परम्परा को बदलने का प्रयत्न करना व्यर्थ होता है,वहाँ शांति से काम लेना ही उचित है। मैंने कभी नहीं कहा कि मैं अपने ही घर में इस तरह चौकी पर नहीं बैठ सकती, न ही किसी प्रकार की कोई बहस ही कभी की, परंतु कभी बैठी भी नहीं। उनके घर भी कभी कभी जाना हुआ पर तब उन्होंने मुझसे कुर्सी पर बैठने को ही कहा और मैं बैठ भी गई शायद उनके सामने हमेशा खड़े रहने से इतना तो वह लोग भी समझ ही गए थे कि मैं ऐसा नहीं करूँगी। और मजे की बात यह कि उनके घर में मेरे सास ससुर की उपस्थिति में भी वह स्वयं भी नीचे चौकी डाल कर नहीं बैठीं बल्कि काम के बहाने यथासंभव खड़ी ही रहीं।


अर्चना सक्सेना

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