यादों के अलाव

यादों के अलाव

फुर्सत के पलों में गुनगुनी धूप में बैठे हों तो अक्सर पुरानी यादों का पिटारा खुल जाता है। और चंचल मन अतीत में न जाने कहाँ-कहाँ तक झाँक आता है,मैं जब भी पीछे मुड़कर देखती हूँ तो अम्मा के संग गांव में बितायेे हुए दिनों की झलक रोमांचित कर जाती है। मुझे और बचपन की सुनहरी यादें आज भी स्वर्ण रश्मियों सी बिखर जाती हैं ज़ेहन में अम्मा के साथ गाँव जाना खुर्जा के बाद गाँव तक का रास्ता रघु काका के तांगे पर तय करना ...तांगा उलार हो रहा है उतरो-उतरो  बोलते हुए रघु काका,काँजी के बड़े और ताई जी से नमक-मिर्च की पुड़िया लेकर खेत की तरफ भागना वहाँ ताजे चने के साग की मुलायम पत्तियों को रहट के पानी से धोकर खाना,रात को ताऊ जी और अम्मा का कहानी सुनाना पर इस शर्त के साथ की हुंकारा भरते रहो अहा!

अविस्मरणीय है सब आज भी इन यादों की गर्माहट सर्दियों में अलाव सा सेक दे जाती है।अम्मा की लाड़ली थी मैं सो कई -कई महीने उनके साथ गाँव में रह आती थी,बचपन से ही हर माहौल में ढ़ल जाने की मेरी आदत ने मुझे जीवन के अनेक सुखद पल दिये हैं और मैंने उनका आनन्द भी उठाया है,चारा काटने की मशीन चलाना हो,बैलों को अनाज के ढैर पर गोल चक्कर लगवाना हो या जिद्द करके चूल्हा लीपना हो क्योंकि उसकी सोंधी महक मुझे बहुत अच्छी लगती थी, बूढ़े बाबा के मेले से खेत से इक्कठी की हुई गेहूं की बालियों के बदले मनपसंद चीजें लेने का सुख आज मॉल से खरीदे हुए किसी भी सामान पर भारी है।

बचपन की गुनगुनी यादों का जिक्र मूंगफली के बिना पूरा हो ही नहीं सकता मेरे लिए सर्दी और मूंगफली एक दूसरे के पर्यायवाची हैं मेरी आदत थी स्वेटर और जैकेट की बाहों में मूंगफली भरकर रखना फिर बिंदास भाई-बहनों या दोस्तों के संग खेलते हुए खाना।
आज अक्सर सोचती हूँ कि काश ऐलिस की तरह मैं भी अपने बचपन के वंडरलैंड में फिर से जा पाती और उन पलों को दुबारा भरपूर जी पाती।

सुमेधास्वलेख,
स्वरचित, मौलिक।

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