यादें

यादें




यादों का सिलसिला ,जो आज महफिल में चल पड़ा....
दिल फिर से बच्चा बन मचल पड़ा,
सुनने सुनाने का सिलसिला जो चल पड़ा,
भूल कर अपने को हर कोई,
यादों में खोने लगा,
समां बांधने लगे यादों के किस्से कहानी,
स्मरण पटल पर जाग गई धूमिल स्मृतियां पुरानी,
कोई बचपन के गलियारों में घुमा लाता,
कोई सुनाता जवानी की दास्तां अपनी पुरानी,
यादों का सिलसिला जो यह चल पड़ा,
समय खंड फिर से पीछे मुड़ा,
भूल कर हर व्यक्तित्व अपना बड़ा,
यादों के सागर में डुबकी लगाने लगा,
सिलसिला यादों का उन टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों में ले चला,
जहा जीता था बचपन डंडे से टायर दौड़ाते हुए,
उंगलियों में कंचे फंसाते हुए,
पतंग लूटने के लिए दौड़ लगाते हुए,
हवाई चप्पल पहनकर इतराते इठलाते हुए,
यादों का सिलसिला जो महफ़िल में आज चल पड़ा,
सौंधी मिट्टी की खुशबू में लिपे हुए आंगन तक ले चला,
याद आ गया वह जमाना, जो पीछे कहीं छूट गया
मिट्टी के चूल्हे में हंडिया पकती हुई रोटियां सिकती हुई,
नीम के मुंडेर पर लगता वह जमावड़ा,
हुक्के की गुड़गुड़ाहट संग चलता संवाद बड़ा,
चुटकियों में जो निपटाता विवाद छोटा या बड़ा,
यादों का सिलसिला जो आज चल पड़ा,
आंखों के सामने फिर से लहराने लगी फसलें ,खिले कुमुद दल याद आने लगे,
बगिया में अमिया तोड़ता बचपन और पतझड़ का गमन बसंत आगमन ,
हर्षित करता था जो हर क्षण,
जीवन अब बनकर रह गया रण,
ना रही हरियाली और ना रहा वह पतझड़,
ना रहा बेफिक्र बचपन, और ना रहे जवानी के वे हसीन पल ,
और रहे ना वह संवाद,
यादों बन रह गई है स्मृति चिन्ह,
महफिलों में कभी यादों का सिलसिला चल जाता है,
दिल पिघल कर जुबान से सिलसिला बन यादों का निकल जाता है।
दीपिका राज सोलंकी, आगरा उत्तर प्रदेश










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