यादें-कल आज और कल

यादें-कल आज और कल

क्या कहूँ, कहाँ से शुरू करूँ, कुछ समझ नहीं आता??

क्या हुआ क्या बड़बड़ा रही हो, पतिदेव ने पूछा।

अरे आज डाॅटर डे है ना, तो सबलोग इसी पर लिखने में लगे हैं, मैं क्या लिखूँ कुछ समझ नहीं आ रहा।

इसमें समझने जैसा क्या है, तुम खुद एक बेटी हो एक बेटी की माँ हो, जो चाहे लिख सकती हो।

उन्होंने तो बड़ी आसानी से कह दिया कि कुछ भी लिख सकती हो, पर उनके कहे इन लफ़्ज़ों ने मेरे मन में उथल-पुथल सी मचा दी, क्या सच में बड़ा आसान है एक बेटी होना और एक बेटी के जज़्बातों को समझते हुए उसे कागज पर उकार देना।


कहने और सुनने में जितना आसान लगता है, उससे कहीं ज्यादा कठिन है यह सब, पर कौन समझाए इन्हें, खैर छोड़ो, चलिए अपने बचपन का एक किस्स बताती हूँ।

हमारा घर एक ऐसी जगह था जहाँ नीचे पापा की दुकान और ऊपर मकान होता था। हमारी दुकान के बगल में एक मिठाई वाले अंकल की दुकान थी, मैं जब भी स्कूल से वापिस आती थी पापा से लड्डू की जिद्द करने लग जाती और पापा हमेशा दिला देते और अगर भाई जिद्द करता तो उसे कभी-कभी ही दिलाते थे।

इस पर मिठाई वाले अंकल कहते, "अरे भाईसाहब, लड़कियों को इतना सिर पर चढ़ाना अच्छी बात नहीं, हाँ बबुआ जिद्द करे तो समझ आता है।

पापा ने कुछ नहीं कहा, बस मुस्करा दिए।

वहीं एक दिन मेरी अपनी बेटी, जब माॅल गये तो पिज्जा खाने की जिद्द करने लगी, उसके पापा ने झिड़क दिया, एक तो फिजूल खर्च और ऊपर से जंक फूड।

बेटे ने कोल्ड ड्रिंक मांगी तो दिला दी, बिटिया ने कुछ नहीं कहा, मैंने भी उस वक्त बच्चों के सामने कुछ कहना उचित नहीं समझा, बाद में घर आकर बात की।


अब आप ही बताइए किस का बचपन ज्यादा बेहतर हुआ, कहने को पुराने ज़माने के लोगों को बेटियों में भेद-भाव करने का जिम्मेदार ठहरा दिया गया है, लेकिन असल फर्क पुराने और नये ज़माने का नहीं, असल फर्क है हमारी अपनी सोच का, जिसका ना तो ज़माने के फेर से कोई दरकार है और ना ही अनपढ़ता या पढ़े-लिखे होने से।

खुद ही मुस्करा उठी मैं यह सब सोचकर और हल्के से अपना सिर झटका लग गई घर के काम निपटाने।

चलते-चलते आप सभी को डाॅटर डे की लख-लख बधाई। 

धन्यवाद। 

शिल्पी गोयल। 

#बेटी

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