ये कैसी मानसिकता

ये कैसी मानसिकता

पहाड़ों  के बीच बसी घाटी ,विषम भौगोलिक परिस्थितियां,दुरूह जीवन शैली, आधुनिक सुविधाएं शहरों की तुलना में बहुत कम।अधिकांश महिलाएं पुरूषों की तुलना मेंअधिक मेहनती । फिर भी एक नैसर्गिक प्रक्रिया से गुज़रने के दिनों में उन्हें इस तरह अलग कर दिया जाता मानों कोई अभिशाप झेल रही हों।

जी हाँ सुदूर पर्वतीय स्थानों में मैंने देखा कि मासिक धर्म के दिनों में महिलाओं एक अलग जगह पर बैठा दिया जाता ।वहीं ज़मीन पर चटाई या फिर कोई पुराना सा बिस्तर होता जिस पर वह सोती ।इन दिनों उसके हाथ का स्पर्श अशुद्ध मानते । धार्मिक क्रियाकलापों में तो उसकी भागीदारी वर्जित ही होती, पर सामान्य दिनों-जीवन में भी उसे कुछ छूने की अनुमति नहीं होती ।

रसोई भी परिवार का कोई अन्य व्यक्ति करता ।उसे खाना भी अलग दिया जाता यहां तक की बर्तन भीअलग ।दूर से उनमें खाना डाल दिया जाता।पाँच दिन तक बिल्कुल अलग रहने के बाद नदी किनारे जाकर इस्तेमाल किए गए हर वस्त्र-बिस्तर वगैरह को उसे धोना होता और फिर स्नान कर घर में प्रवेश  करती ।जहाँ नदी नहीं वहां घर के बाहरी हिस्से में ये सब करना होता ।  

न बताते हुए भी  बच्चे-पुरूषऔर देखने वालों को सब पता चल जाता।ये सब देखकर मैं सोचने में विवश हो जाती कि यदि अपवित्र और अशुद्ध मान भी रहें हो तो रजस्वला के साथ व्यवहार सामान्य होना चाहिए।शिक्षित एवं शहरीय परिवेश में भी तो महिलाएं इन दिनों से होकर गुज़रती हैं ।वहां तो सब कुछ सामान्य लगता है।स्वच्छता आवश्यक है पर संकीर्ण मानसिकता के चलते  रजस्वला से भेदभाव उचित नहीं। ये एक नैसर्गिक प्रक्रिया है जो नारी की संपूर्णता का प्रतीक होता है। 

डॉ यास्मीन अली

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