ये क्या बदतमीजी है?

ये क्या बदतमीजी है?

" मुस्कान !कल की तैयारी कर ली ना!"
" कैसी तैयारी अनोखी?"
" अरे! रंग और गुलाल की।" 
"हाँ! हाँ! कर ली।"
" और खाने में?"

" सब कुछ कर लिया।" मुस्कान ने कहा।"गुझिया,दहीबड़े सबकुछ रेडी है ।पर मैं कल कॉलोनी में खेलने नहीं जाऊँगी?"" क्यों?"अनोखी को बहुत आश्चर्य हुआ।"तुम्हें तो होली खेलना बहुत पसंद है। तुम्हारे लिए ही तो मैं आती हूँ, इसलिए तो मम्मी ने मुझे  आज रात में रुकने की परमिशन भी दे दी है।  कल तुम्हारे साथ खेल कर ही जाऊँ। साल भर इंतजार करती हो और अब कह रही नहीं खेलूँगी।"" हाँ यार !पिछली बार देखा था तुमने बगल वाली पूजा आंटी ने क्या किया था। अब बहुत डर लगता है।"

" कुछ नहीं होगा ।तू चिंता मत कर।"सुबह सुबह चारों तरफ होली की धूम मची थी। "होली है भई होली है! बुरा न मानो होली है!" अरे! कहाँ हो भई मुस्कान, अनोखी और मुस्कान की मम्मी ?आ जाओ ।"बगल वाली आंटी जी आ चुकी थी। जिसका मुस्कान को डर था। सुमन जी( मुस्कान की मम्मी) बाल्टी भर पानी और रंग के साथ नीचे जाए और साथ में अनोखी भी थी ।

"आइए !आइए !पूजा जी! हम तो आप ही का इंतजार कर रहे थे।" मुस्कान कहाँ है ?"बिना कोई जवाब दिए सुमनजी उन्हें रंग लगाने लगी।  साथ में आई महिलाएँ भी एक दूसरे को रंग लगाने लगी। अनोखी भी उनके शामिल थी। तभी पूजा ने अपने साड़ी के पल्लू में बँधा एक रंग भरा पुड़िया निकाला और हाथ में लेकर अनोखी को लगाने चल दी। तभी पीछे से मुस्कान ने पूजा जी का हाथ पकड़ लिया ।
"यह क्या बदतमीजी है मुस्कान?"

" मैं बदतमीजी कर रही और आप क्या कर रहे हो ?यह चोरी चुपके से आप मेरी दोस्त को क्या लगाने चली थी?"" चोरी से क्या ?रंग है। रंग लगाना मना है क्या?"" रंग लगाना मना नहीं है पर केमिकल लगाना मना है। आपके पिछले साल की इसी हरकत ने मेरी बाँहों पर ऐसा दाग छोड़ा कि अब मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर सकती ।यह देखिए।" सब ने देखा कि वहाँ पर एक काला दाग था जो बहुत बड़ा था और बुरा भी ।मुस्कान की आँखों में आँसू आ गए।"

आप जैसे लोग ही है जो केमिकल, मिट्टी, कीचड़ जो कुछ मिल जाए सब लेकर एक दूसरे पर डालने लगते हैं और होली जैसे पर्व को बदनाम कर रहे। अरे !खेलने की जो परंपरा है उसे निभाइए। बेकार के कामों में पड़कर क्यों इस त्यौहार का मजा खराब कर देते हैं? मैं आपको जानती थी ना इसलिए मैं छिपी हुई थी। मैं जानती थी आप यह काम जरूर करेंगी ।मम्मी ने कहा भी कि, नहीं! वह समझदार है। ऐसा कुछ नहीं होगा पर मैं जानती हूँ कुछ लोग अपनी हरकतों से कभी बाज नहीं आते ।"पूजा जी की आँखें ऐसी नीचे झुकी कि वह नजरें उठा ही नहीं सकी।उनकी होली अब हो चुकी थी।वह घर जाने के लिए निकल पड़ी थी।

डाॅ मधु कश्यप 

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