ज़ीरो अंडा

ज़ीरो अंडा

मम्मी कल एग्जाम है क्या?”
नहीं बेटा,पर तुम क्यों पूछ रहे हो?
वो मैम बोल रही थी कि,” पढ़ लो बच्चों नहीं तो एग्जाम में कुछ नहीं लिख पाओगे। ज़ीरो अंडा आयेगा।ज़ीरो अंडा।”

मेरे बेटे ने अजीब सा मुँह बनाते हुए जिस तरह से अपनी मैम की आवाज़ निकालने की कोशिश की मेरी हँसी छूट गई और मेरा बेटा मन से हल्का हो कर खेलने चला गया।इस छोटे से इंसिडेंट को अगर चाहो तो इग्नोर कर सकते है पर अगर बच्चे के मन को पढ़ना चाहते है और आगे कोई बड़ी समस्या खड़ी न हो इसके लिए , इस पूरी घटना का विशलेषण करना आवश्यक है। न केवल इस घटना का वरन इस तरह के तमाम किस्सों का जो हमारे और बच्चों के बीच होते है।

आप अपने बच्चों के मन को पढ़ना सीखेंगी। और बहुत सी समस्या जो हकीकत में समस्या है भी नहीं बड़ा रूप लेने से बच जाएगी और हम अपने बच्चों के व्यक्तित्व को सकारात्मक आयाम दे पाएंगे।आपको जानकर आश्चर्य होगा मेरा बेटा अभी सीनियर केजी का बच्चा है और उससे “ज़ीरो अंडा और फेल” यह शब्द मैने पहली बार सुने। मुझे याद है मेरी बेटी नौ साल की हो गई और उसने फेल शब्द तब सीखा जब उसकी स्पैलिंग पाठ्यक्रम का हिस्सा बनी।

और उसने “फेल “का अर्थ भी एक “अर्थ”के रुप में ही पूछा था न कि एक डर और हौवा के तौर पर। दोनों ही स्थतियों में बहुत फर्क है। मेरे लिये यह बहुत मन खराब करने वाली बात थी कि स्कूल में बच्चों को इतनी छोटी उम्र में यह सब कहा जा रहा है। इतना दबाव एक सीनियर केजी के बच्चे पर।

मैं अगले दिन अपने बच्चे के स्कूल गयी उसकी क्लास टीचर से मिली ,उन्होंने अमूमन जैसा की सभी प्राइवेट स्कूल में किया जाता है कहाँ,”मैम यह एक जनरल कही गयी बात थी ,किसी एक बच्चे को पोइंट करके नहीं कहा था अगर फिर भी इसका इफेक्ट हुआ तो “आई एम सॉरी”।

इन शब्दों के बाद आप क्या कहेंगे? लेकिन मैने कहाँ,”आपकी जनरल कही गयी बात मेरे बच्चे के मन में डर बैठा गई हमेशा के लिए । सुबह उठते ही पहला सवाल रोज का ,”मम्मी आज एग्जाम है क्या?” आप इसका मतलब समझते है?आप प्लीज़ रिक्वेस्ट है डोन्ट यूज़ नेगेटिव वर्ड्स इन फ्रंट ऑफ ऐनी चाईल्ड”
इतना कह कर मैं वापस आ गयी । लेकिन मेरे लिए एक चुनौती खड़ी हो गयी कि आखिर बच्चे के मन से यह डर कैसे निकालूँ?

यकीन मानिए मेरे बच्चे को इस डर से मैं पूरी तरह नहीं निकाल पाई अभी तक लेकिन उसे इतना समझा पाई हूँ कि “ज़ीरो अंडा और फेल ” होना बूरा नहीं है। उसे हर गलती पर मैं प्यार से और सकारात्मक तरीक़े से वह गलती सुधारने को प्रेरित करती हूँ। इस बात को तीन महीने बीत गये है और अब फाईनल एग्जाम की दस्तक भी हो गई है । यह शब्द सुनते ही बेटा एक बार को सकते में आ जाता है लेकिन जब मैं कहती हूँ ,”एग्जाम नहीं है बस आपको अलग बैंच पर बिठा कर आपसे लिखवाया जाएगा वही सब जो अभी तक आपने पढ़ा है।” तब वह थोड़ा सा रिलेक्स होता है। लेकिन बस अपने प्यार से ही मैं उसका यह डर दूर कर सकती हूँ। और धीरे-धीरे मैं उसे इस अंधेरे कुएँ से निकाल भी लूँगी, इसकी पूरी आशा है मुझे।

पर एक रिक्वेस्ट सभी शिक्षक शिक्षिकाओं से है कि आप चाहे छोटे बच्चों को पढ़ाते है या बड़े बच्चों को जब भी राय दे उन्हें,” शब्दों का इस्तेमाल सोच समझ कर करें। हर बच्चा एक सा नहीं होता वह आपके कहे शब्दों को किस तरह से लेता है यह उस पर कितना प्रभाव डालता है आप कल्पना नहीं कर सकते है क्योंकि आज भी कई बच्चों के पहले आदर्श उनके शिक्षक ही होते है। मेरे बच्चे की भी वो मैम फेवरेट है तो उसे उनकी बात सही लगती है और वो एकदम से मान भी लेता है।”

एक रिक्वेस्ट पैरेंट्स से भी है अपने बच्चों के मन को पढ़ना सीखें उनकी आँखों में छूपे डर को पहचानने के लिये उन्हें समय और प्यार दे। छोटी लगने वाली बाते कब एक बच्चे के व्यक्तित्व पर नकारात्मक असर डालने लगती है पता ही नहीं चलता। ।

धन्यवाद ,अनामिका अनु।

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